Coal Gasification Project: जब भी कोयले का नाम आता है, तो आमतौर पर लोगों के मन में बिजली उत्पादन और थर्मल पावर प्लांट की तस्वीर उभरती है। लेकिन बदलते वैश्विक हालातों के बीच भारत ने कोयले के उपयोग को नए नजरिए से देखना शुरू किया है। दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध, व्यापारिक तनाव और सप्लाई से जुड़ी परेशानियों ने यह साफ कर दिया है कि केवल ऊर्जा ही नहीं, बल्कि जरूरी औद्योगिक रसायनों में भी आत्मनिर्भर होना बेहद जरूरी है।
कोयले से तैयार होगा जरूरी रसायन
सरकार की योजना के तहत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कोयले का इस्तेमाल कर पहले सिंथेसिस गैस यानी सिंगैस तैयार की जाएगी। इसके बाद इसी गैस से अमोनियम नाइट्रेट बनाया जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण रसायन है, जिसका उपयोग खेती के लिए खाद तैयार करने और खनन व इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले औद्योगिक विस्फोटकों के निर्माण में किया जाता है।
आयात पर निर्भरता होगी कम
इस परियोजना का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारत को अमोनियम नाइट्रेट के लिए विदेशों पर कम निर्भर रहना पड़ेगा। अनुमान है कि साल 2030 तक यह प्लांट देश की कुल जरूरत का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा अकेले पूरा कर सकेगा। इसका मतलब है कि देश की एक बड़ी मांग घरेलू स्तर पर पूरी होगी।
हर साल होगी हजारों करोड़ की बचत
इस परियोजना के शुरू होने के बाद अमोनियम नाइट्रेट के आयात में करीब 6.6 लाख टन की कमी आने की उम्मीद है। इससे हर साल लगभग 3,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बच सकेगी। यह वह राशि है जो अभी तक विदेशों से खरीदारी पर खर्च होती थी।
लंबे समय में बड़ा आर्थिक फायदा
विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना के पूरे संचालन काल में भारत को लगभग 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी करीब 75,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। यह पैसा देश के विकास, नई परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लगाया जा सकेगा।
सरकार दे रही है विशेष प्रोत्साहन
भारत सरकार ने साल 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीफिकेशन का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार करीब 46,000 करोड़ रुपये तक के वित्तीय प्रोत्साहन भी दे रही है। इससे इस क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और नई तकनीकों का विकास होगा।
आत्मनिर्भर औद्योगिक शक्ति बनने की दिशा में कदम
जानकारों का मानना है कि यह परियोजना केवल एक औद्योगिक योजना नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा कदम है। इससे भारत वैश्विक बाजार पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा। भविष्य में यदि दुनिया में कच्चे माल की कमी, युद्ध या सप्लाई से जुड़ी कोई बड़ी समस्या आती है, तब भी देश की विकास गति पर उसका ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। यह पहल भारत को एक बड़े उपभोक्ता देश से आगे बढ़ाकर आत्मनिर्भर औद्योगिक शक्ति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
