Lucknow Coaching Fire: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में कोचिंग सेंटर की इमारत में लगी भीषण आग में कई लोगों की जान चली गई। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर आधुनिक शहरों में आग जैसी दुर्घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं।इससे पहले दिल्ली के मालवीय नगर में होटल में लगी आग और देश के कई अन्य शहरों में हुए अग्निकांड भी फायर सेफ्टी सिस्टम की कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं। हर हादसे के बाद जांच और कार्रवाई होती है, लेकिन समय के साथ सुरक्षा के वादे अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं।
15 मीटर की सीमा और फायर NOC का लूपहोल
कई भवन नियमों के अनुसार एक तय ऊंचाई से कम इमारतों को फायर NOC की अनिवार्यता से छूट मिल जाती है। यही नियम कई बार सुरक्षा जांच से बचने का रास्ता बन जाता है।लखनऊ की घटना में भी इमारत की ऊंचाई ऐसी थी कि उसे अनिवार्य फायर NOC की श्रेणी में नहीं रखा गया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल ऊंचाई के आधार पर सुरक्षा मानकों को तय करना पर्याप्त है।
रिहायशी इमारतों का व्यावसायिक इस्तेमाल
देश के कई शहरों में रिहायशी मंजूरी वाली इमारतों में दुकानें, कोचिंग सेंटर और अन्य व्यवसाय चलाए जा रहे हैं। इससे लोगों की संख्या बढ़ जाती है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था उसी हिसाब से विकसित नहीं की जाती।ऐसी जगहों पर पर्याप्त निकासी मार्ग, फायर उपकरण और आपातकालीन व्यवस्था का अभाव बड़ा खतरा बन सकता है।
बिजली का ओवरलोड और खराब रखरखाव
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में अधिकतर आग की घटनाओं की वजह इलेक्ट्रिकल फॉल्ट होती है। क्षमता से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल, खराब वायरिंग और समय पर जांच न होना आग लगने का कारण बन सकता है।
कानून मजबूत लेकिन पालन कमजोर
भारत में नेशनल बिल्डिंग कोड जैसे स्पष्ट नियम मौजूद हैं। समस्या नियम बनाने में नहीं बल्कि उनके पालन और नियमित निरीक्षण में दिखाई देती है।कई बार शुरुआती मंजूरी के बाद इमारतों में बदलाव कर दिए जाते हैं, निकासी रास्तों पर कब्जा कर लिया जाता है और सुरक्षा उपकरणों का रखरखाव नहीं किया जाता।
हादसे के बाद कार्रवाई, पहले क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अधिकारियों की कार्रवाई अक्सर हादसे के बाद ही क्यों शुरू होती है। कई मामलों में अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन की जानकारी पहले से होती है, लेकिन समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए जाते।
क्या बदल पाएगा भारत का फायर सेफ्टी सिस्टम?
आंकड़े बताते हैं कि आग की घटनाएं हर साल हजारों लोगों की जान ले रही हैं। ।विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नए नियम बनाने से समस्या हल नहीं होगी। नियमित जांच, डिजिटल निगरानी, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और नागरिकों की जागरूकता के बिना ऐसे हादसों को रोकना मुश्किल होगा।लखनऊ जैसी घटनाएं एक चेतावनी हैं कि फायर सेफ्टी को कागजी प्रक्रिया नहीं बल्कि रोजमर्रा की प्राथमिकता बनाने की जरूरत है
