Legal News: वकीलों की सोशल मीडिया रील्स पर उठे सवाल, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, किसने PIL दाख़िल कर रोक लगाने करी मांग

सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में सोशल मीडिया पर वकीलों की रील्स, डिजिटल प्रचार और अदालत परिसर में वीडियोग्राफी पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने इसे पेशेवर आचार संहिता का उल्लंघन बताया है।

PIL Filed Against Lawyers’ Reels, सोशल मीडिया पर इन दिनों वकीलों की रील्स और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। कई वीडियो में वकील अदालत के गाउन और बैंड पहनकर कानूनी सलाह देते या खुद का प्रचार करते नजर आते हैं। कुछ वीडियो में अदालत परिसर की झलक दिखाई जाती है, जबकि कुछ में क्लाइंट से जुड़े मामलों का जिक्र भी होता है। अब इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस तरह का डिजिटल प्रचार वकालत की गरिमा और पेशेवर आचार संहिता के खिलाफ है।

दो वकीलों ने दायर की जनहित याचिका

दिल्ली के अधिवक्ता अनिल पांडे और एआर त्रिपाठी ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दाखिल की। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश देने की मांग की है कि वकीलों द्वारा सोशल मीडिया पर किए जा रहे प्रचार, रील्स और वीडियो पर सख्ती से नियम लागू किए जाएं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अदालत परिसर और वकीलों की वेशभूषा का इस्तेमाल प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए।

क्या है नियम 36 का प्रावधान?

याचिका में कहा गया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 के तहत कोई भी वकील प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने पेशे का विज्ञापन नहीं कर सकता। इसके बावजूद कई वकील इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर खुद को विशेषज्ञ बताकर वीडियो बना रहे हैं। इनमें मोबाइल नंबर, उपलब्धियां और कानूनी सेवाओं का प्रचार भी किया जाता है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह नियमों का सीधा उल्लंघन है।

कोर्ट की वेशभूषा और परिसर के इस्तेमाल पर भी सवाल

याचिका में यह भी कहा गया है कि बार काउंसिल के नियमों के अनुसार कोर्ट के बाहर सार्वजनिक स्थानों पर बैंड और गाउन पहनना प्रतिबंधित है। केवल वकीलों से जुड़े आधिकारिक आयोजनों में इसकी अनुमति है। इसके बावजूद कई लोग अदालत परिसर और कोर्ट रूम के आसपास रील्स बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, जिससे न्यायपालिका की गरिमा प्रभावित हो रही है।

पहले भी जताई जा चुकी है आपत्ति

याचिका में बताया गया है कि 3 जुलाई 2024 को मद्रास हाईकोर्ट ने भी वकीलों की डिजिटल रैंकिंग और अप्रत्यक्ष प्रचार पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने जुलाई 2024 और मार्च 2025 में कई प्रेस विज्ञप्तियां जारी कर नियमों के पालन पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट परिसर में वीडियोग्राफी और रील्स बनाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया था।

याचिकाकर्ताओं की क्या दलील है?

अनिल पांडे और एआर त्रिपाठी का कहना है कि उन्होंने 2 जुलाई 2026 को मुख्य न्यायाधीश और बार काउंसिल के अध्यक्ष को इस मुद्दे से अवगत कराया था। जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना है कि “लीगल अवेयरनेस”, “नो योर राइट्स” और “लीगल टिप्स” जैसे नामों के जरिए कई लोग वास्तव में अपना प्रचार कर रहे हैं और क्लाइंट जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई है?

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नियम 36 और अन्य संबंधित प्रावधानों का सख्ती से पालन कराने का निर्देश दिया जाए। साथ ही सोशल मीडिया पर प्रचार करने वाले वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई, कोर्ट परिसर में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और रील्स पर देशभर में रोक, वकीलों की वेशभूषा के प्रचारात्मक इस्तेमाल पर प्रतिबंध और डिजिटल आचार संहिता तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी की गई है। फिलहाल इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का इंतजार है।

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