बुजुर्गों के लिए खुशखबरी,अब वृद्धाश्रमों और पेंशन योजनाओं के लिए बनेगा विशेष विभाग

संसदीय समिति ने भारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को देखते हुए उनके लिए एक अलग विभाग बनाने की सिफारिश की है। वर्तमान में मंत्रालय का ढांचा 15 करोड़ बुजुर्गों की जरूरतों के लिए अपर्याप्त है। 2050 तक बुजुर्गों की संख्या 35 करोड़ होने का अनुमान है, जिससे भविष्य में समर्पित प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ गई है।

 Senior Citizens: भारत में वरिष्ठ नागरिकों की तेजी से बढ़ती आबादी को देखते हुए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थाई समिति ने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। समिति ने दिव्यांगजनों के लिए बने विशेष विभाग की तर्ज पर अब बुजुर्गों के लिए भी एक अलग और समर्पित विभाग बनाने की पुरजोर सिफारिश की है। समिति का स्पष्ट मानना है कि वर्तमान में मंत्रालय के पास मौजूद प्रशासनिक ढांचा बुजुर्गों की बढ़ती जरूरतों और उनकी जटिल समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं है। इस मांग का समर्थन विभिन्न वरिष्ठ नागरिक संगठन भी लंबे समय से कर रहे हैं, ताकि देश के वृद्धों को बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सम्मान मिल सके।

क्यों जरूरी है बुजुर्गों के लिए अलग विभाग

भाजपा सांसद और संसदीय समिति के अध्यक्ष पीसी मोहन की अध्यक्षता में की गई इन सिफारिशों में तर्क दिया गया है कि जिस प्रकार दिव्यांगजनों की लगभग ढाई करोड़ की आबादी के लिए एक स्वतंत्र विभाग कार्य कर रहा है, उसी प्रकार बुजुर्गों के लिए भी विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। वर्तमान में देश में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या करीब पंद्रह करोड़ है, जिसके साल 2036 तक तेईस करोड़ और साल 2050 तक पैंतीस करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। भविष्य की इन चुनौतियों को देखते हुए एक समर्पित विभाग ही नीतिगत निर्णयों और योजनाओं को धरातल पर उतारने में सक्षम होगा। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण से जुड़े नए प्रस्तावित कानून के लागू होने के बाद सरकारी गतिविधियों में और भी अधिक बढ़ोत्तरी होने की संभावना है।

वृद्धाश्रमों के संचालन और राज्यों की भूमिका

संसदीय समिति ने देश भर में संचालित वृद्धाश्रमों की स्थिति पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। इस पर मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि केंद्र सरकार के लिए गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के साथ मिलकर लगभग आठ सौ वृद्धाश्रमों का सीधा संचालन करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस समस्या के समाधान के लिए अब राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है। अधिकांश राज्य सरकारें इस जिम्मेदारी में हाथ बंटाने के लिए सहमत हो गई हैं। जल्द ही राज्यों के साथ मिलकर वृद्धाश्रमों के बेहतर और पारदर्शी संचालन के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जाएगी, जिससे बुजुर्गों को मिलने वाली सुविधाओं में गुणात्मक सुधार होगा।

भविष्य की जनसंख्या और सामाजिक संतुलन

जनसांख्यिकीय रिपोर्टों के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि साल 2046 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या, शून्य से पंद्रह वर्ष तक के बच्चों की कुल आबादी से भी अधिक हो जाएगी। साल 2050 तक देश की कुल जनसंख्या में बीस प्रतिशत हिस्सेदारी केवल वरिष्ठ नागरिकों की होगी। वर्तमान में मंत्रालय के भीतर केवल एक छोटी सी शाखा बुजुर्गों के मामलों को देखती है, जिसमें कर्मचारियों की संख्या भी बेहद सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते एक सशक्त विभाग का गठन नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में वृद्धों की देखभाल और उनके अधिकारों की रक्षा करना एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन सकता है।

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