Sabarimala Case Update: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता

सबरीमाला सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन को लेकर गहन बहस जारी है।

Sabarimala Case Hearing: सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी भी धर्म को कमजोर या खोखला नहीं किया जा सकता। यह बात सुनवाई के दौरान काफी अहम मानी जा रही है।

9 जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बड़ी पीठ कर रही है। इस दौरान धर्म की आजादी और सामाजिक सुधार के अधिकार के बीच संतुलन पर विस्तार से चर्चा हो रही है। यह मामला देश के संवैधानिक ढांचे से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।

सिंघवी ने रखे अपने तर्क

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की तरफ से अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25(2)(ख) सभी वर्गों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देता है। वहीं, अनुच्छेद 26(ख) धार्मिक संस्थाओं को अपने अंदरूनी नियम और परंपराओं को संभालने का अधिकार देता है।

दोनों अनुच्छेदों में संतुलन जरूरी

सिंघवी का कहना था कि इन दोनों अनुच्छेदों को साथ में समझना जरूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक अधिकार दूसरे को पूरी तरह खत्म कर दे। उन्होंने कहा कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन इससे धर्म की पहचान को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

जजों ने उठाए अहम सवाल

सुनवाई के दौरान जजों ने भी कई अहम सवाल पूछे। जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि अनुच्छेद 25(2)(ख) में “सामाजिक सुधार” शब्द क्यों जोड़ा गया है। इस पर सिंघवी ने कहा कि यह उन प्रथाओं को सुधारने के लिए है, जो समय के साथ गलत साबित हो चुकी हैं।

पुराने फैसलों का दिया गया हवाला

सिंघवी ने अपने तर्कों में पुराने कोर्ट फैसलों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि किसी कानून का मकसद किसी धर्म को खत्म करना नहीं होना चाहिए। इसी संदर्भ में जस्टिस नागरत्ना ने दोहराया कि सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता।

धर्म की स्वतंत्रता पर जोर

सिंघवी ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 25(1) के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता बहुत अहम है। इसे किसी भी तरह कम नहीं किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथा जरूरी है और कौन सी नहीं।

आगे के फैसले पर नजर

इस मामले की सुनवाई अभी जारी है और देशभर की नजर इस पर टिकी हुई है। कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाले समय में धर्म और कानून के बीच संतुलन तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

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