ग्रेटर नोएडा की गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था। इसमें छात्र से 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था।
इसके साथ ही 5-5 लाख रुपये की रकम वाले दो जमानतदारों की भी मांग की गई थी। नोटिस में आरोप लगाया गया था कि छात्र दूसरे विद्यार्थियों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसा रहा था और इससे शांति एवं कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
नोटिस को छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मामले पर कड़ी नाराजगी जताई।
कोर्ट ने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दे चुका था, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने इसके बावजूद नोटिस कैसे जारी कर दिया।
सीजेआई ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए पूछा कि मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। अदालत ने मामले में अधिकारी से स्पष्टीकरण लेने की बात भी कही।
मजिस्ट्रेट पर हुई कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इस मामले में नया अपडेट सामने आया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि छात्र को नोटिस जारी करने वाले कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सस्पेंड कर दिया गया है।
यानी सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी के बीच प्रशासन ने संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की है। इससे पहले पुलिस ने भी विवाद बढ़ने के बाद नोटिस वापस ले लिया था। पुलिस के मुताबिक, 5 सितंबर को गलत तरीके से जारी किया गया नोटिस रद्द कर दिया गया था।
पुलिस रिपोर्ट पर हुई थी कार्रवाई
पुलिस रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने छात्र के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू की थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि छात्र दूसरे छात्रों को प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहा था। इसी आधार पर उससे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया था। हालांकि, छात्र ने इन आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह लंबे समय से यूनिवर्सिटी नहीं गया था।
नोटिस वापस लेने के बाद भी सवाल
पुलिस ने नोटिस वापस ले लिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला उठने के बाद विवाद खत्म नहीं हुआ। अदालत में यह सवाल सामने आया कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाई थी, तो उसके बावजूद ऐसा नोटिस क्यों जारी किया गया। अब मजिस्ट्रेट के सस्पेंशन के बाद मामला और गंभीर हो गया है। इससे प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही और छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
