Jagannath Rath Yatra: ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा आज 16 जुलाई से शुरू हो रही है। यह सनातन धर्म के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथों में सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। इस दिव्य उत्सव में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। मान्यता है कि भगवान के रथ के दर्शन करने और उसकी रस्सी खींचने से सभी तीर्थों के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा जीवन के पापों का नाश होता है।
हर साल नए रथ क्यों बनते हैं और क्या है उनकी खासियत?
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए हर वर्ष नए रथ तैयार किए जाते हैं। इनका निर्माण सामान्य लकड़ी से नहीं, बल्कि ‘दारु’ कहलाने वाली पवित्र नीम की लकड़ी से किया जाता है। विशेष लक्षणों वाले नीम के पेड़ों का चयन मंदिर की परंपरागत समिति करती है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन विशाल रथों के निर्माण में एक भी लोहे की कील का उपयोग नहीं होता। पूरी संरचना पारंपरिक लकड़ी की जोड़ाई से तैयार की जाती है। रथ निर्माण की प्रक्रिया बसंत पंचमी से शुरू होकर अक्षय तृतीया से गति पकड़ती है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। तीनों रथों के रंग, आकार और ध्वज भी अलग-अलग होते हैं।
गुंडीचा मंदिर की यात्रा और छेरा पहरा की अनोखी परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार गुंडीचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। तीनों भाई-बहन यहां नौ दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बाहुदा यात्रा के माध्यम से श्रीमंदिर लौटते हैं। रथ यात्रा शुरू होने से पहले ‘छेरा पहरा’ नामक परंपरा निभाई जाती है, जिसमें पुरी के गजपति महाराज स्वयं सोने की झाड़ू से तीनों रथों और मार्ग की सफाई करते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं तथा सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
विशाल रथ, रस्सी खींचने का महत्व और सालबेग की अनोखी कहानी
भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ लगभग 45.6 फीट, बलभद्र का तालध्वज करीब 45 फीट और देवी सुभद्रा का दर्पदलन लगभग 44.6 फीट ऊंचा होता है। यात्रा में सबसे आगे बलभद्र का रथ, उसके बाद सुभद्रा और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है। मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने वाले भक्त को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान की कृपा बनी रहती है। इस यात्रा की सबसे प्रेरणादायक परंपराओं में से एक यह भी है कि भगवान जगन्नाथ का रथ मुस्लिम भक्त सालबेग की मजार के सामने कुछ समय के लिए रुकता है। यह परंपरा सदियों से सामाजिक समरसता, भक्ति और मानवता का संदेश देती आ रही है।
सोना बेषा के साथ होता है दिव्य समापन
बाहुदा यात्रा के बाद जब तीनों देवता श्रीमंदिर लौटते हैं तो एकादशी के दिन उनका स्वर्ण आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसे ‘सोना बेषा’ कहा जाता है। इस दिव्य दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, परंपरा, समानता और सेवा भाव का अद्भुत संगम है। यही कारण है कि यह उत्सव भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।









