Jagannath Special: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से शुरू हुई थी और इसका समापन 27 जुलाई को नीलाद्रि बीजे की परंपरा के साथ होगा। यह भव्य धार्मिक उत्सव करीब नौ दिनों तक चलता है। रथ यात्रा के पहले दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने विशाल रथों पर सवार होकर पुरी स्थित श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना होते हैं। गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक प्रवास करने के बाद तीनों देव विग्रह बहुदा यात्रा के जरिए वापस श्रीमंदिर लौटते हैं।
क्या है नीलाद्रि बीजे
रथ यात्रा पूरी करके श्रीमंदिर लौटने के बाद भगवान जगन्नाथ सीधे अपने सिंहासन पर विराजमान नहीं होते। इससे पहले नीलाद्रि बीजे की विशेष परंपरा निभाई जाती है। इसे रथ यात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। नीलाद्रि महोदय को जगन्नाथ संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है, जिसमें श्रीमंदिर से जुड़ी परंपराओं और वार्षिक नीतियों का उल्लेख मिलता है। इसी परंपरा के अनुसार नीलाद्रि का अर्थ उस नील पर्वत से है, जहां भगवान जगन्नाथ का मंदिर स्थित है, जबकि ओड़िया भाषा में बीजे का अर्थ प्रवेश करना या विराजमान होना माना जाता है।
श्रीमंदिर में वापसी की रस्म
जब भगवान जगन्नाथ अपनी यात्रा पूरी करके श्रीमंदिर वापस लौटते हैं, तब उनके विग्रहों को गर्भगृह में विराजमान करने से पहले विशेष रस्म निभाई जाती है। इसी परंपरा को नीलाद्रि बीजे कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह भगवान जगन्नाथ के श्रीमंदिर में दोबारा प्रवेश और उनके सिंहासन पर विराजमान होने से पहले की महत्वपूर्ण रस्म है। इस परंपरा के जरिए रथ यात्रा के समापन को धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण माना जाता है।
माता लक्ष्मी क्यों होती हैं नाराज
नीलाद्रि बीजे की परंपरा का संबंध भगवान जगन्नाथ की पत्नी माता लक्ष्मी से भी माना जाता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ जब रथ यात्रा पर निकले थे, तब माता लक्ष्मी उनके साथ नहीं गई थीं। इसी वजह से जब भगवान वापस श्रीमंदिर लौटते हैं तो माता लक्ष्मी उनसे नाराज रहती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, माता लक्ष्मी मंदिर का द्वार बंद कर देती हैं और भगवान जगन्नाथ को अंदर प्रवेश नहीं करने देतीं। इसके बाद भगवान उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं।
रसगुल्ले से खुलता है मंदिर का द्वार
नीलाद्रि बीजे की सबसे प्रसिद्ध परंपरा भगवान जगन्नाथ द्वारा माता लक्ष्मी को रसगुल्ला भेंट करने से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को छेना और चाशनी से बनी मिठाई रसगुल्ला अर्पित कर उन्हें मनाते हैं। भगवान के इस प्रेमपूर्ण आग्रह के बाद माता लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं और मंदिर का द्वार खोल देती हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर में प्रवेश करते हैं और सिंहासन पर विराजमान होते हैं। इसी परंपरा की स्मृति में आज भी नीलाद्रि बीजे के दिन भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ला भोग अर्पित किया जाता है। इसी के साथ विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का औपचारिक समापन माना जाता है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। News1India किसी भी मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी मान्यता या जानकारी को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ या जानकार से सलाह जरूर लें।
