Funeral Raises Questions on Identity: गुजरात के नवसारी जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने धर्म, सामाजिक स्वीकार्यता और अंतिम संस्कार की परंपराओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 55 वर्षीय एक पारसी महिला, जिसने पूरी जिंदगी अपने पारसी धर्म और रीति-रिवाजों का पालन किया, मृत्यु के बाद अपने ही समुदाय की अंतिम संस्कार परंपराओं का हिस्सा नहीं बन सकीं। हैरानी की बात यह रही कि मुस्लिम पति होने के बावजूद उन्हें मुस्लिम कब्रिस्तान में भी जगह नहीं मिल पाई। आखिर में उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया।
कॉलेज में हुई थी मुलाकात
जानकारी के मुताबिक, महिला ने कई साल पहले एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी की थी, जो गुजराती साहित्य के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। मूल रूप से जूनागढ़ के रहने वाले प्रोफेसर करीब 35 साल पहले नवसारी में आकर बस गए थे। दोनों की मुलाकात एक कॉलेज में हुई थी। उस समय प्रोफेसर वहां पढ़ाते थे और महिला गुजराती विषय में स्नातक की पढ़ाई कर रही थीं। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर उन्होंने विवाह करने का फैसला कर लिया।
शादी के बाद बढ़ीं मुश्किलें
परिवार से जुड़े लोगों के अनुसार, जब महिला ने अपने माता-पिता को शादी के बारे में बताया तो उन्होंने शुरुआत में इसका विरोध किया। उन्हें डर था कि अंतरधार्मिक विवाह के कारण परिवार को पारसी समाज से अलग कर दिया जाएगा। बाद में परिवार ने बेटी की इच्छा को स्वीकार कर लिया और शादी हो गई। हालांकि, विवाह के बाद महिला को समुदाय की कई सामाजिक गतिविधियों से दूर रखा गया। यहां तक कि उन्हें अपने भाई और बहन की शादी में शामिल होने की अनुमति भी नहीं मिली थी। समय के साथ उनके माता-पिता ने फिर से उनसे संबंध सुधार लिए थे।
जीवनभर निभाईं पारसी परंपराएं
परिजनों का कहना है कि शादी के बाद भी महिला ने कभी इस्लाम धर्म नहीं अपनाया। उन्होंने पूरी जिंदगी पारसी धर्म की मान्यताओं और परंपराओं का पालन किया। दंपति की कोई संतान नहीं थी। कुछ दिन पहले महिला की तबीयत अचानक खराब हुई, जिसके बाद उन्हें नवसारी के एक पारसी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
अंतिम संस्कार को लेकर बढ़ी परेशानी
महिला की मृत्यु के बाद उनके पति ने पारसी समाज के लोगों से संपर्क किया। उन्होंने अनुरोध किया कि उनकी पत्नी का अंतिम संस्कार पारसी रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाए, क्योंकि उन्होंने जीवनभर उसी धर्म का पालन किया था। लेकिन समुदाय के प्रतिनिधियों ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसके बाद परिवार ने मुस्लिम कब्रिस्तान प्रबंधन से संपर्क किया और इस्लामी तरीके से दफनाने की अनुमति मांगी। वहां से भी अनुमति नहीं मिली। दो दिनों तक शव अस्पताल के शवगृह में रखा रहा और परिवार समाधान तलाशता रहा।
मानवता के आधार पर मिली मदद
जब कोई रास्ता नहीं निकला, तब महिला के एक रिश्तेदार ने अपने मित्र और विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता सज्जन भरवाड़ से संपर्क किया। उन्होंने मानवीय आधार पर मदद की पेशकश की। परिवार की सहमति मिलने के बाद नवसारी के वेरावल क्षेत्र स्थित श्मशान गृह में अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई। शुक्रवार को महिला का हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार दाह संस्कार किया गया। इस दौरान उनके रिश्तेदार और पति के परिवार के सदस्य मौजूद रहे। बाद में अस्थियां उनके पति को सौंप दी गईं।
धर्म से ऊपर मानवता
सज्जन भरवाड़ का कहना है कि यह किसी धर्म का नहीं, बल्कि इंसानियत का मामला था। जब दोनों समुदायों से समाधान नहीं मिला, तब उन्होंने मानवता के नाते परिवार की सहायता की। यह घटना एक बार फिर अंतरधार्मिक विवाह, सामाजिक स्वीकार्यता और मृत्यु के बाद धार्मिक पहचान से जुड़े कई अहम सवालों को चर्चा में ले आई है।
