BiharNews: राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुनी गईं बांका की खुशबू,जाने कैसा रहा उनका तराज़ू से कलम तक सफर

बांका की शिक्षिका खुशबू कुमारी का चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए हुआ है। वह शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति भवन में सम्मान प्राप्त करेंगी। खास बात यह है कि उनके गांव राधानगर को शिक्षा की राह पर लाने वाले शिक्षक राधारमण सिन्हा को भी 1978 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। उनकी कोशिशों से गांव की कई पीढ़ियां शिक्षा से जुड़ीं।

BiharNews: बिहार के बांका जिले की शिक्षिका खुशबू कुमारी इन दिनों चर्चा में हैं। उनका चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए हुआ है। शिक्षक दिवस के मौके पर वह राष्ट्रपति भवन पहुंचकर यह सम्मान प्राप्त करेंगी। लेकिन खुशबू की उपलब्धि सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है। इसके पीछे एक ऐसे गांव की बदलती तस्वीर है, जहां कभी पढ़ाई का नाम तक मुश्किल से सुनाई देता था।

कभी व्यापार था सहारा, आज शिक्षा बनी पहचान

खुशबू कुमारी कटोरिया प्रखंड के राधानगर गांव की रहने वाली हैं। करीब चार दशक पहले तक गांव के ज्यादातर परिवार पारंपरिक व्यापार से जुड़े हुए थे। शिक्षा को लेकर जागरूकता बहुत कम थी। आठवें दशक तक गांव में मुश्किल से कोई मैट्रिक पास व्यक्ति होता था।फिर गांव के सरकारी विद्यालय में शिक्षक राधारमण सिन्हा की नियुक्ति हुई। उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ पूरे गांव में शिक्षा के प्रति सोच बदलने का काम शुरू किया।

शिक्षक ने तराजू वाले हाथों में थमाई कलम

राधारमण सिन्हा की मेहनत का असर धीरे-धीरे पूरे गांव पर दिखाई देने लगा। जिन हाथों में कभी तराजू हुआ करता था, उन्हीं हाथों में किताब और कलम आने लगी।

नई पीढ़ी के बच्चों ने पढ़ाई को अपना रास्ता बनाया। कुछ ही दशकों में राधानगर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जिस गांव में कभी मैट्रिक पास लोगों की संख्या गिनी-चुनी थी, वहां आज एक दर्जन से ज्यादा शिक्षक हैं।

गांव में कई बड़े पदों पर पहुंचे युवा

राधानगर के विकास कुमार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, जबकि डॉ. सुमन कुमार टीएनबी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। गांव के अन्य युवाओं ने भी शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की है।

किसी ने बैंकिंग क्षेत्र में जगह बनाई तो कोई इंजीनियर बना। कुंदन कुमार सेक्शन ऑफिसर हैं और विकास कुमार लोको पायलट के पद पर कार्यरत हैं। गांव के ही ललन कुमार और चंद्रशेखर मंडल शिक्षक बने।

गुरु के सम्मान में बदला गांव का नाम

राधारमण सिन्हा को वर्ष 1978 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। उनके सम्मान में ग्रामीणों ने गांव का नाम बदलकर राधानगर कर दिया।

ग्रामीणों के मुताबिक, उस समय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से पुरस्कार लेते राधारमण सिन्हा की तस्वीरें गांव के कई घरों में लगाई गई थीं। गुरु के प्रति सम्मान और शिक्षा के प्रति बढ़ते लगाव ने गांव को एक अलग पहचान दी।

अब गुरु के बाद शिष्या को राष्ट्रपति सम्मान

खुशबू कुमारी ने भी अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव के मध्य विद्यालय से की। आज उसी गांव की बेटी राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुनी गई हैं।खुशबू के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि जिस विद्यालय से उन्होंने शिक्षा हासिल की, उसी परंपरा से जुड़े एक शिक्षक राधारमण सिन्हा पहले ही राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।

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