Lucknow land scam: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ भूमाफियाओं ने अर्बन सीलिंग की लगभग 270 बीघे सरकारी जमीन को निजी संपत्ति की तरह बेच डाला। इस भूमि की बाजार दर 2 अरब रुपये से अधिक आंकी गई है। औरंगाबाद जागीर और औरंगाबाद खालसा क्षेत्र में फैली इस बेशकीमती जमीन पर न केवल प्लॉट काटे गए, बल्कि अवैध रूप से सड़कें और मकान भी बन चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कागजों में आज भी यह जमीन ‘सरकारी’ दर्ज है, लेकिन धरातल पर माफियाओं का कब्जा है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) और जिला प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी ने भूमाफियाओं के हौसले बुलंद कर दिए हैं, जिससे सरकारी खजाने को भारी चपत लगी है।
अर्बन सीलिंग की जमीन पर माफियाओं का ‘राज’
विस्तृत विवरण के अनुसार, औरंगाबाद जागीर की 2,43,185.55 वर्ग मीटर और औरंगाबाद खालसा की 4,33,760.89 वर्ग मीटर भूमि अर्बन सीलिंग के दायरे में आती है। कुल मिलाकर यह 6.76 लाख वर्ग मीटर से अधिक का क्षेत्र है। नियमानुसार, अर्बन सीलिंग की जमीन को न तो बेचा जा सकता है और न ही इसका निजी व्यावसायिक उपयोग हो सकता है।
बावजूद इसके, प्रॉपर्टी डीलरों ने बिना किसी वैध लेआउट या टाउनशिप योजना के, इस जमीन पर धड़ल्ले से प्लाटिंग की। आज यहाँ सैकड़ों लोग मकान बनाकर रह रहे हैं, जबकि प्रशासन यह दावा करता रहा कि उसे इसकी भनक तक नहीं लगी।
एलडीए और प्रवर्तन दस्ते की भूमिका पर सवाल
वर्ष 2008 में शासन ने एलडीए को इन जमीनों का ‘कस्टोडियन’ नियुक्त किया था ताकि इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। जमीन का मूल मालिकाना हक जिला प्रशासन के पास है। लेकिन कस्टोडियन और जिला प्रशासन, दोनों ही अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे।
एलडीए का प्रवर्तन दस्ता, जिसका काम अवैध निर्माण को रोकना है, पूरी तरह निष्क्रिय बना रहा। जब बिजली की लाइनें बिछाई जा रही थीं और पक्की सड़कें बन रही थीं, तब किसी अधिकारी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई। सूत्रों का दावा है कि इस Lucknow खेल में शामिल कई माफियाओं ने इसी काली कमाई के जरिए राजनीतिक रसूख हासिल कर लिया है, जिसके कारण उन पर कार्रवाई करने से अधिकारी कतराते रहे हैं।
पल्ला झाड़ते जिम्मेदार अधिकारी
इस मामले में जब एलडीए के संयुक्त सचिव सुशील प्रताप सिंह से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि विहित प्राधिकारी के रूप में उन्होंने अपने पास आई सभी ध्वस्तीकरण और सीलिंग की फाइलों का निस्तारण किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई करने की जिम्मेदारी ‘प्रवर्तन विभाग’ की थी। उनके इस बयान से साफ झलकता है कि विभाग के भीतर ही जवाबदेही को लेकर एक-दूसरे पर पल्ला झाड़ने का खेल चल रहा है।
क्या अब होगा एक्शन?
वर्तमान स्थिति यह है कि Lucknow माफिया अरबपति बन चुके हैं और आम जनता, जिसने अपनी गाढ़ी कमाई इन अवैध प्लॉटों में लगा दी है, अब अधर में लटकी है। सवाल यह उठता है कि क्या योगी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत इन भूमाफियाओं और लापरवाह अधिकारियों पर गाज गिरेगी? क्या 2 अरब की इस सरकारी संपत्ति को वापस हासिल किया जा सकेगा, या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा?
Lucknow के बीचों-बीच हुआ यह जमीन घोटाला न केवल सुरक्षा तंत्र पर सवाल उठाता है, बल्कि भ्रष्ट तंत्र और माफियाओं के गहरे गठजोड़ को भी उजागर करता है।









