Shakumbhari Mela: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राज्य के मंदिरों से जुड़े मेलों और त्योहारों का प्रबंधन सरकार के हाथों में लेने के निर्णय को भाजपा नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी है। स्वामी ने 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी अधिसूचना और आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए इसे रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि राज्य सरकार का यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 31-ए का उल्लंघन करता है। स्वामी ने यह भी मांग की है कि राज्य सरकार को मंदिरों के मेलों को सरकारी आयोजन घोषित करने से रोका जाए। इस मामले पर सुनवाई 17 जनवरी 2024 को होगी।
स्वामी ने किया प्रदेश सरकार के फैसले पर सवाल
भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2017 में जारी की गई अधिसूचना को चुनौती दी गई है। इस अधिसूचना के तहत राज्य सरकार ने मंदिरों के मेलों (Shakumbhari Mela) और त्योहारों का प्रबंधन अपने हाथों में लेने का निर्णय लिया था। स्वामी का आरोप है कि यह कदम भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है। उन्होंने याचिका में यह भी कहा है कि राज्य सरकार मंदिरों के धार्मिक समारोहों पर नियंत्रण और प्रशासन करने का कोई अधिकार नहीं रखती।
याचिका में कहा गया है कि यूपी सरकार की यह अधिसूचना असंवैधानिक और अवैध है, क्योंकि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धर्म के पालन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 31-ए (नागरिकों के संपत्ति के अधिकार) का उल्लंघन करती है। स्वामी ने इस अधिसूचना को रद्द करने की मांग की है और यह भी कहा है कि राज्य सरकार को मंदिरों के मेलों और त्योहारों को सरकारी मेला घोषित करने से रोका जाए।
मेलों को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर लाना उद्देश्य
उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि मेलों को सरकारी मेला घोषित करने का निर्णय श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए लिया गया है। सरकार का उद्देश्य इन मेलों को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर लाना है। शाकुंभरी माता मंदिर सहित अन्य प्रमुख (Shakumbhari Mela) शक्तिपीठों के मेलों में लाखों श्रद्धालु हर साल नवरात्रि के दौरान आते हैं। सरकार के अनुसार, इससे जिला प्रशासन को इन मेलों के आयोजन में मदद मिलेगी और लोगों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।
इस मामले की सुनवाई 17 जनवरी 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में होगी, जहां यह तय होगा कि राज्य सरकार का यह निर्णय संविधान के अनुरूप है या नहीं।