उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। लेकिन इस बार चुनाव की तारीखों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसकी वजह फरवरी 2027 में प्रस्तावित जनगणना का दूसरा चरण है, जो चुनावी कार्यक्रम से टकरा सकता है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जा सकते हैं। हालांकि अभी तक चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
राजनीतिक दलों ने बढ़ाई सक्रियता
सूत्रों के अनुसार, प्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। बहुजन समाज पार्टी की मंडल स्तर की बैठकों में कार्यकर्ताओं को सक्रिय रहने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं समाजवादी पार्टी भी संभावित उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया में जुटी हुई है। भारतीय जनता पार्टी बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और बैठकें आयोजित करने में लगी है। अन्य दल भी बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
फरवरी में प्रस्तावित है जनगणना का दूसरा चरण
करीब 15 साल बाद देश में होने जा रही जनगणना का दूसरा चरण फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। इस चरण में आबादी की गणना के साथ-साथ जातीय आंकड़े भी जुटाए जाने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में इस कार्य के लिए लगभग 5.5 लाख अधिकारी और कर्मचारी लगाए जाएंगे। यही कर्मचारी चुनाव कराने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। ऐसे में एक ही समय पर जनगणना और चुनाव करवाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
चुनाव आयोग के सामने क्या विकल्प हैं?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, चुनाव आयोग के सामने कई विकल्प मौजूद हैं। एक संभावना यह है कि उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों के चुनाव नवंबर या दिसंबर 2026 में ही करा लिए जाएं, ताकि फरवरी में पूरा प्रशासनिक तंत्र जनगणना पर ध्यान दे सके। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि कुछ राज्यों के चुनाव पहले कराए जाएं और उत्तर प्रदेश में बाद में मतदान कराया जाए। हालांकि इन संभावनाओं पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
उपचुनावों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं
प्रदेश की घोसी, फरीदपुर और दुद्धी विधानसभा सीटें फिलहाल खाली हैं। सामान्य नियमों के अनुसार छह महीने के भीतर इन सीटों पर उपचुनाव कराए जाने चाहिए। लेकिन राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि विधानसभा चुनाव समय से पहले कराने का फैसला लिया जाता है, तो इन सीटों पर अलग से उपचुनाव कराने की बजाय सीधे विधानसभा चुनाव तक इंतजार किया जा सकता है।
पिछले चुनावों का रहा अलग-अलग समय
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की तारीखें समय-समय पर बदलती रही हैं। वर्ष 1996 में चुनाव सितंबर-अक्टूबर में हुए थे। इसके बाद अधिकांश चुनाव फरवरी-मार्च में कराए गए।
यदि जनगणना के कारण चुनावी कार्यक्रम में बदलाव होता है, तो करीब तीन दशक बाद प्रदेश फिर एक अलग चुनावी कैलेंडर देख सकता है। फिलहाल सभी राजनीतिक दल सतर्क हैं और चुनाव आयोग के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं।
