Environment Protection Campaign: मत्स्य पुराण का एक प्रसिद्ध श्लोक कहता है कि दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है। इस श्लोक का सीधा संदेश है कि पेड़ और पानी जीवन का सबसे बड़ा आधार हैं। एक बेटा केवल परिवार का सहारा बनता है, लेकिन एक पेड़ कई पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित रखने की ताकत रखता है।
भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा ने हमेशा प्रकृति को सम्मान दिया। हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण की रक्षा को केवल धार्मिक भावना नहीं माना, बल्कि जीवन का जरूरी हिस्सा समझा। आज उत्तर प्रदेश में चल रहा बड़ा वृक्षारोपण अभियान उसी सोच को आगे बढ़ाने का प्रयास माना जा रहा है।
एक समय ऐसा भी था जब प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती थी। जंगल लगातार कम होते गए, तालाब और जलाशय खत्म होते गए और भूजल का स्तर भी गिरता गया। वर्ष 2017 में जब नई सरकार बनी, तब वन विभाग की नर्सरियों में केवल करीब पांच लाख पौधे ही उपलब्ध थे। यह स्थिति भविष्य के लिए चिंता का विषय थी।
इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान शुरू किया गया। इस अभियान में सरकारी विभागों के साथ-साथ आम लोगों, स्कूलों, संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को भी जोड़ा गया। इसका परिणाम यह रहा कि वर्ष 2017 से अब तक लगभग 242 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस पर एक दिन में 5 करोड़ पौधे लगाए गए, जबकि 12 जुलाई को एक ही दिन में 35 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इस अभियान के लिए प्रदेश की नर्सरियों में 57 करोड़ से अधिक पौधे तैयार किए गए हैं।
पहले भी कई सरकारों ने पौधरोपण अभियान चलाए थे, लेकिन पौधों की देखभाल पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। अब पौधे लगाने के साथ उनकी सुरक्षा और देखरेख की भी व्यवस्था की जा रही है। इसी वजह से उम्मीद है कि लगाए गए पौधों का बड़ा हिस्सा भविष्य में मजबूत पेड़ों के रूप में विकसित होगा और प्रदेश के मौसम व पर्यावरण को बेहतर बनाने में मदद करेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान भी लोगों को भावनात्मक रूप से प्रकृति से जोड़ रहा है। जब कोई व्यक्ति अपनी मां के नाम पर पौधा लगाता है, तो वह उसकी देखभाल भी जिम्मेदारी के साथ करता है। इससे पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक अभियान बन जाता है।
बदलते मौसम का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ रहा है। समय पर बारिश न होना, अचानक ओलावृष्टि, जल्दी गर्मी या कम सर्दी जैसी समस्याएं खेती को प्रभावित कर रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों की कमी और पर्यावरण असंतुलन इसका बड़ा कारण है। ऐसे में अधिक से अधिक पेड़ लगाना इस समस्या का आसान और प्रभावी समाधान माना जाता है।
हमारे पूर्वजों ने पीपल, बरगद जैसे पेड़ों को विशेष महत्व दिया, ताकि लोग उन्हें सुरक्षित रखें। इसी तरह कुएं, तालाब और बावड़ियों का निर्माण भी समाज की जिम्मेदारी माना जाता था। आज जरूरत है कि हम उसी सोच को आधुनिक समय के अनुसार अपनाएं। उत्तर प्रदेश में चल रहा वृक्षारोपण अभियान इसी दिशा में एक मजबूत कदम है। यदि समाज और सरकार मिलकर लगातार ऐसे प्रयास करते रहें, तो आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास की रफ्तार भी बनी रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य मिलेगा।


