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पांचवीं कक्षा के बाद छात्राओं के लिए यहां बंद हो जाती है पढ़ाई, आज भी झोपड़ियों में लगती है क्लास

by Web Desk
अगस्त 4, 2022
in शिक्षा
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आजादी के 75वें साल का जश्न मना रहे है। 21वीं सदी चल रही है फिर भी सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में जब शिक्षा की स्थिति पर नजर डालते हैं, तो कई ऐसे गांव मिल जाएंगे, जहां आज तक सरकारी स्कूलों के भवन तक नहीं हैं और लकड़ी की बनी झोपड़ी में कक्षाएं चलती हैं।

कई स्कूल ऐसे भी हैं, जहां तक पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं है। ऐसे सुदूरवर्ती गांवों के विद्यार्थियों खासकर छात्राओं के लिए पांचवीं कक्षा के बाद शिक्षा के द्वार बंद हो जाते हैं।

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दरअसल जिला मुख्यालय खूंटी से 50 किमी दूर पश्चिमी सिंहभूम की सीमा से सटे बोहोण्डा पंचायत का तोतकोरा एक गांव है। कोचांग से साली गांव तक आधी पक्की आधी कच्ची सड़क है। साली गांव के आगे तीन किमी तक पहाड़ है।  

विद्यालय का भवन तक नहीं बन पाया

जिसकी पगडंडियों पर पैदल चलकर तोतोकरा गांव पहुंचा जा सकता है। इस गांव में एक सरकारी उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय है। सड़क नहीं होने के कारण आज तक विद्यालय का भवन तक नहीं बन पाया।

इसी बीच तोतकोरा गांव के साउ सोय बताते हैं कि 19 साल पहले ग्रामीणों ने जंगल से लकड़ियां काटकर एक झोपड़ी बनायी थी और उसके ऊपर प्लास्टिक का छप्पर है। यहां दो पारा शिक्षक हैं बरजू सोय और मार्टिन सोय। दोनों शिक्षक कोचांग से साली तक साईकिल से आते हैं और फिर पैदल पहाड़ों की पगडंडियों से होकर स्कूल जाते हैं।

वहीं गर्मी और बारिश के मौसम में शिक्षकों को स्कूल जाने में काफी परेशानी होती है। स्कूल के बच्चे पांचवीं तक की पढ़ाई पूरा करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर और झरझरा के स्कूलों में अपना नामांकन कराते हैं। यहां स्कूल का संचालन नियमित रूप से होता है। बच्चों को मध्याह्न भोजन के साथ अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं।

अब गांव के लगभग सभी लोग हिंदी सीख गये हैं

इसके बाद साउ सोय बताते हैं कि 17 साल पहले इस गांव में सिर्फ तीन लोग ही हिंदी बोल पाते थे, लेकिन दोनों पारा शिक्षकों की कोशिश के बाद अब गांव के लगभग सभी लोग हिंदी सीख गये हैं। बोहोण्डा पंचायत के कुदादारू गांव में स्कूल की हालत और भी बुरी है।

तोतकोरा से सात पहाड़ियों को पैदल पार कर इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। जहां स्थानीय पत्थरों से खड़ी की गयी दीवार और प्लास्टिक के तिरपाल से ढ़के छप्पर के नीचे स्कूल चलता है। यहां कभी-कभार ही शिक्षक आते हैं।

कुदादारू के स्कूल को देखकर उसे किसी भी दृष्टिकोण से स्कूल नहीं कहा जा सकता, लेकिन है सरकारी स्कूल। इन गांवों तक पहुंचना आम लोगों के लिए आज भी आसान नहीं है। यह घोर नक्सल प्रभावित इलाका है।

पगडंडियों से होकर बच्चे जाते हैं स्कूल

उल्लेखनीय है कि ये सभी गांव खूंटी, सरायकेला और पश्चिमी सिंहभूम जिले की सीमा पर है और इस इलाके को प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी का सेकेंड हेडक्वार्टर कहा जाता है। अड़की प्रखंड के तिरला पंचायत मुख्यालय में स्थित स्कूल भवन तक भी सड़क नहीं बनी है। पगडंडियों से होकर बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। अड़की की ही सरगेया पंचायत के कई ऐसे स्कूल हैं, जहां तक पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं है।

खूंटी जिले का ही एक प्रखंड है रनिया। पहले लोग इसे कालापानी कहते थे। जिस कर्मचारी को सजा देनी होती थी, उसका तबादला रनिया प्रखण्ड में कर दिया जाता था। खैर झारखंड राज्य गठन के बाद स्थिति में तो काफी सुधार हुआ है लेकिन अधिकतर गांवों की स्थिति में अब तक कोई सुधार नजर नहीं आता।

बच्चों को बैठना होता है पेड़ के नीचे

इसी प्रखंड में एक पंचायत है डाहु यहां एक राजकीयकृत मध्य विद्यालय है गोरसोद और खटखुरा पंचायत के प्राथमिक विद्यालय ओलंगेर में विद्यालय तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है। ओलंगेर में तो विद्यालय भवन भी नहीं है। इसके कारण बच्चों को पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है।

कमोवेश यही स्थिति आरसी मध्य एवं उच्च विद्यालय, पिडुल की भी है। आने-जाने के लिए पक्की सड़क भी बनी है, लेकिन विडम्बना है कि रास्ते में पड़ने वाले सिकरिया नाला पर पुलिया नहीं है। इसके कारण बरसात के दिनों में स्कूली बच्चों को जान जोखिम में डालकर स्कूल जाना पड़ता है। इस सम्बंध में डाहु पंचायत के मुखिया रिमिस कंडुलना, खटखुरा की मुखिया मंजू सुरीन और जयपुर की मुखिया प्रतिमा कंडुलना ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यह बहुत ही दुःख की बात है। सरकार को इस ओर अविलम्ब ध्यान देना चाहिए।

ये भी पढ़े-Janjgir: बच्चे ने सुनाया संस्कृत का गलत श्लोक..तो कलेक्टर सिन्हा ने श्लोक को कुछ इस तरह सुधारा

Tags: EDUCATION NEWSHEMANT SORENJharkhandKhuntiNews1India
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