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Rath Yatra 2026: जगन्नाथ रथ यात्रा में भगवान के साथ क्यों नहीं होतीं राधा और रुक्मिणी? जानिए इसकी पौराणिक कथा

16 जुलाई से शुरू होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा आस्था का बड़ा पर्व है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा होती है। जानिए राधा और रुक्मिणी के साथ न होने की पौराणिक कथा और यात्रा का महत्व।

by SYED BUSHRA
जुलाई 13, 2026
in धर्म
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Jagannath Rath Yatra 2026: विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से शुरू हो रही है। हर साल ओडिशा के पुरी में निकलने वाली इस भव्य यात्रा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से इस रथ यात्रा में भाग लेते हैं, उन्हें जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। इतना ही नहीं, यह भी माना जाता है कि इस पवित्र यात्रा का दर्शन और इसमें शामिल होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी वजह से भगवान जगन्नाथ के भक्त पूरे साल इस यात्रा का इंतजार करते हैं। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अनोखा संगम भी माना जाता है।

राधा और रुक्मिणी क्यों नहीं

जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे खास बात यह है कि इसमें भगवान जगन्नाथ यानी श्रीकृष्ण के साथ उनकी पत्नी रुक्मिणी या प्रिय सखी राधा नहीं होतीं। इस यात्रा में उनके साथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विराजमान रहते हैं। तीनों देवताओं की मूर्तियां भी सामान्य मूर्तियों से अलग होती हैं, क्योंकि इनमें केवल शरीर का ऊपरी हिस्सा दिखाई देता है। यह दुनिया की उन विरली परंपराओं में से एक है, जहां भाई-बहन एक साथ पूजे जाते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन स्कंद पुराण में वर्णित कथा सबसे अधिक प्रसिद्ध मानी जाती है।

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राधा नाम से जुड़ी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण गहरी नींद में विश्राम कर रहे थे और माता रुक्मिणी उनके चरण दबा रही थीं। उसी दौरान भगवान के मुख से अचानक “हे राधे” शब्द निकला। यह सुनकर रुक्मिणी के मन में जिज्ञासा और ईर्ष्या दोनों पैदा हो गईं। उन्होंने सोचा कि वह हमेशा भगवान की सेवा करती हैं, फिर भी उनके मन में राधा का स्थान इतना विशेष क्यों है। यह बात उन्होंने अन्य रानियों से भी साझा की। जब यह बात माता रोहिणी तक पहुंची तो उन्होंने सभी रानियों को बुलाया और इस रहस्य को बताने की बात कही। साथ ही उन्होंने सुभद्रा से कहा कि जब तक वह कथा सुनाएं, तब तक श्रीकृष्ण और बलराम को उस स्थान पर आने से रोकें।

कैसे बना दिव्य स्वरूप

माता रोहिणी जैसे ही राधा और श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम का वर्णन करने लगीं, उसी समय श्रीकृष्ण और बलराम वहां पहुंच गए। सुभद्रा ने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन माता रोहिणी की वाणी उनके कानों तक पहुंच गई। कथा सुनते ही तीनों दिव्य प्रेम में ऐसे भाव-विभोर हो गए कि उनके शरीर का निचला हिस्सा मानो विलीन होने लगा और वे एक विशेष दिव्य रूप में दिखाई देने लगे। उसी समय नारद मुनि वहां पहुंचे। भगवान का यह अद्भुत स्वरूप देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि यह अलौकिक रूप सभी भक्तों को भी देखने का अवसर मिलना चाहिए। भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और तभी से इस विशेष स्वरूप में भक्तों को दर्शन देने की परंपरा शुरू हुई।

ऐसे निकलती है यात्रा

हर वर्ष आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को तीन विशाल लकड़ी के रथों में विराजमान कर पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। इस मार्ग को ‘बड़ा डंडा’ कहा जाता है। तीनों देवता लगभग एक सप्ताह तक गुंडिचा मंदिर में विराजते हैं और इसके बाद वापस श्रीमंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को ‘बहुडा यात्रा’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस यात्रा के दर्शन करते हैं या रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं, उनके जीवन में सुख, समृद्धि और यश की वृद्धि होती है तथा भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

Tags: Hindu festivalJagannath Rath YatraLord Jagannath
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SYED BUSHRA

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