Matchbox Silk Saree: भारत में साड़ी महिलाओं की सबसे पसंदीदा पारंपरिक पोशाकों में से एक मानी जाती है। आमतौर पर 5.5 मीटर लंबी साड़ी को संभालकर रखने के लिए अलमारी में अच्छी-खासी जगह चाहिए होती है, लेकिन तेलंगाना के एक बुनकर ने ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिसने सभी को हैरान कर दिया। सिरसिल्ला के रहने वाले बुनकर नल्ला विजय कुमार ने एक ऐसी रेशमी साड़ी तैयार की है, जो पूरी तरह 5.5 मीटर लंबी और 48 इंच चौड़ी होने के बावजूद एक छोटी सी माचिस की डिब्बी में आसानी से समा जाती है। उनकी इस अनोखी कला का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग उनकी बारीक कारीगरी की जमकर तारीफ कर रहे हैं।
सात दिनों की मेहनत से तैयार हुई अनोखी साड़ी
नल्ला विजय कुमार ने बताया कि इस विशेष साड़ी को तैयार करने में उनके पूरे परिवार ने साथ दिया। इस अनोखी रेशमी साड़ी को बनाने में करीब सात दिन का समय लगा। पारंपरिक हथकरघा तकनीक और बेहद महीन बुनाई की मदद से इसे तैयार किया गया है। साड़ी का कुल वजन केवल 200 ग्राम है और इसे प्रसिद्ध इकत डिजाइन में बुना गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे इस तरह मोड़ा जा सकता है कि पूरी साड़ी एक छोटी सी माचिस की डिब्बी में समा जाए। यही कारण है कि यह अनोखी कलाकृति अब देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
श्रीशैलम मंदिर में देवी को किया गया भेंट
नल्ला विजय कुमार ने अपनी इस दुर्लभ रेशमी साड़ी को प्रसिद्ध श्रीशैलम मंदिर में देवी भ्रमराम्बा को भेंट किया। इस दौरान श्री भ्रामरांबा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष पोथुगुंटा रमेश नायडू और ट्रस्ट की सदस्य कोडे कंथिवर्धिनी भी मौजूद रहीं। मंदिर प्रशासन ने इस अनोखे उपहार का स्वागत करते हुए बुनकर की कला और मेहनत की सराहना की। अब यह विशेष साड़ी मंदिर की शोभा बढ़ा रही है और श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बन गई है।
पारंपरिक हथकरघा कला को मिली नई पहचान
नल्ला विजय कुमार की इस अनूठी रचना ने एक बार फिर भारतीय हथकरघा और पारंपरिक बुनाई की उत्कृष्टता को दुनिया के सामने पेश किया है। बेहद बारीक धागों और महीन तकनीक से तैयार की गई यह साड़ी केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि भारतीय शिल्प कौशल का शानदार उदाहरण भी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो के बाद देशभर से लोग उनकी प्रतिभा की सराहना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी अनोखी रचनाएं न केवल भारतीय हस्तकरघा उद्योग को नई पहचान दिलाती हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को भी पारंपरिक कला और शिल्प से जुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं।









