Bharat Tiwari Encounter: बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने मीडिया के सामने पुलिस कार्रवाई पर कई बड़े सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि यह सामान्य पुलिस मुठभेड़ नहीं, बल्कि पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा थी।
दो दिन पहले बनी योजना
वकील संजीव कुमार सिंह के मुताबिक, 17 जून 2026 को हुई घटना की तैयारी कथित तौर पर 15 जून से शुरू हो गई थी। उनका आरोप है कि 16 जून को शाहपुर के डीएसपी राजेश कुमार शर्मा ने पुलिस मुख्यालय को इलाके में दंगा और बड़े विवाद की सूचना भेजी थी। वकील का दावा है कि यह रिपोर्ट सही नहीं थी और इसी के आधार पर एसटीएफ को वहां भेजा गया।
सरेंडर के बाद क्या हुआ
संजीव कुमार सिंह का कहना है कि एसटीएफ की टीम 16 जून को ही बिलौटी गांव पहुंच गई थी। उनके अनुसार, 17 जून को भरत तिवारी ने फेसबुक लाइव के जरिए आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद भी उसे घेरकर गोली मारी गई। वकील के दावे के मुताबिक, पहले कुछ दूरी से तीन गोलियां चलाई गईं। इसके करीब 15 मिनट बाद वाहन के अंदर से दो और गोलियां मारी गईं।
पांच हथियारों की बात
वकील ने दावा किया कि बैलिस्टिक यानी हथियारों और गोलियों की जांच रिपोर्ट में पांच अलग-अलग पिस्तौल का इस्तेमाल सामने आया है। उनके अनुसार, तीन गोलियां कुछ दूरी से और दो गोलियां बेहद करीब से चलाई गई थीं। उनका आरोप है कि इससे घटना में कई लोगों की भूमिका की जांच जरूरी हो जाती है।
1400 करोड़ का आरोप
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा दावा 1400 करोड़ रुपये के कथित घोटाले को लेकर किया गया है। वकील के अनुसार, यह रकम जवइनिया गांव के विस्थापित लोगों के अधिकारों से जुड़ी थी और इसी घोटाले को छिपाने के लिए भरत तिवारी को रास्ते से हटाने का आरोप है। उन्होंने कहा कि उनके पास बैलिस्टिक रिपोर्ट, फेसबुक लाइव वीडियो, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिसकर्मियों की कॉल डिटेल जैसी सामग्री मौजूद है।
अधिकारियों पर भी आरोप
वकील ने जगदीशपुर डीएसपी, शाहपुर थाना प्रभारी और एसटीएफ के जवानों के साथ जगदीशपुर एसडीएम पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आरा कोर्ट में गैर-जमानती वारंट की मांग की गई है। राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से मामले का संज्ञान लिए जाने और मुख्य सचिव को कार्रवाई के निर्देश दिए जाने का भी दावा किया गया है। अब जांच और अदालत की कार्रवाई से ही साफ होगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।







