Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील पति द्वारा अपनी पत्नी और उसके करीबियों पर किए गए मुकदमों की बौछार को ‘न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग’ मानते हुए शादी को खत्म कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पति के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए साफ किया कि कोई भी व्यक्ति अपनी कानूनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल किसी को प्रताड़ित करने के लिए नहीं कर सकता।
केस की पृष्ठभूमि: 80 मुकदमे और 10 साल का संघर्ष
इस दंपति की शादी साल 2010 में हुई थी और इनके दो बेटे हैं। 2016 से ही दोनों अलग रह रहे थे, लेकिन विवाद तब गहरा गया जब पेशे से वकील पति ने अपनी पत्नी, उसके रिश्तेदारों और यहाँ तक कि पत्नी की वकील के खिलाफ भी 80 से ज्यादा मुकदमे दर्ज करा दिए।
* वकील को भी नहीं छोड़ा: पति ने पत्नी की पैरवी कर रही महिला वकील पर ही अलग-अलग शहरों में 9 केस दर्ज करा दिए थे, ताकि पत्नी को कानूनी मदद न मिल सके।
* जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा: पत्नी का आरोप था कि पति ने बच्चों और घर की सभी जिम्मेदारियां छोड़ दी थीं। भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से बचने के लिए पति ने कई कंपनियों के डायरेक्टर पद से इस्तीफा तक दे दिया था।
संविधान का अनुच्छेद 142:
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस रिश्ते में अब कुछ नहीं बचा है और यह ‘अपरिवर्तनीय तौर पर टूट’ (Irretrievable Breakdown) चुका है। अदालत ने अपने विशेषाधिकार अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए इस विवाह को तुरंत भंग कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश
1. ₹5 करोड़ की एलिमनी: पति की उस दलील को खारिज कर दिया गया जिसमें उसने खुद को भुगतान करने में असमर्थ बताया था। कोर्ट ने उसे पत्नी को ‘वन टाइम सेटलमेंट’ के रूप में 5 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया।
2. सभी केस खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी, उसके रिश्तेदारों और महिला वकील पर पति द्वारा दर्ज कराए गए सभी 80 से अधिक मुकदमों को तुरंत प्रभाव से निरस्त (Quash) कर दिया।
3. मुकदमे में देरी पर फटकार: कोर्ट ने कहा कि पति ने अपनी कानूनी जानकारी का उपयोग केवल मुकदमे को लटकाने और पत्नी को परेशान करने के लिए किया।
