Childhood Trauma Affects: नई रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा, बचपन का डर, हिंसा और उपेक्षा, कैसे डालते हैं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर

नई रिसर्च के अनुसार बचपन में झेला गया मानसिक आघात बड़े होने के बाद शरीर और दिमाग दोनों को प्रभावित कर सकता है। इससे तनाव, हाई ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन, नींद की समस्या और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

How Childhood Trauma Affects Adult Health

Childhood Trauma Affects on Adult Health: बचपन में झेली गई तकलीफें केवल यादों तक सीमित नहीं रहतीं। कई बार उनका असर इंसान के शरीर और दिमाग पर लंबे समय तक बना रहता है। यही वजह है कि कई लोगों को सालों बाद भी अलग-अलग तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं, लेकिन वे उनकी असली वजह नहीं समझ पाते। अब नई रिसर्च यह बता रही हैं कि बचपन में मिला डर, हिंसा, उपेक्षा या भावनात्मक असुरक्षा बड़े होने के बाद शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर सकती है।

कई बीमारियों की वजह बन सकता है ट्रॉमा

विशेषज्ञों का कहना है कि कई लोग माइग्रेन, पेट की परेशानी, नींद न आना, लगातार थकान, चिंता और शरीर में दर्द जैसी समस्याओं का लंबे समय तक इलाज कराते रहते हैं। लेकिन कई मामलों में इन परेशानियों की जड़ बचपन के दर्दनाक अनुभव हो सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब मानता है कि बचपन का ट्रॉमा केवल मानसिक समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के नर्वस सिस्टम, हार्मोन, इम्यून सिस्टम और कई गंभीर बीमारियों के खतरे को भी प्रभावित करता है।

डर और असुरक्षा का शरीर पर असर

विशेषज्ञ डॉ. प्रितिका सिंह के अनुसार, कई मरीजों की मेडिकल रिपोर्ट सामान्य होती है, लेकिन उनकी जीवन यात्रा कुछ और कहानी बताती है। उन्होंने एक 40 वर्षीय महिला का उदाहरण दिया, जो लंबे समय से पीठ दर्द, पेट की परेशानी और एंग्जायटी से परेशान थी। कई जांच और इलाज के बाद भी कारण स्पष्ट नहीं हुआ। बाद में पता चला कि उसके बचपन में घरेलू हिंसा और भावनात्मक उपेक्षा जैसी घटनाएं हुई थीं। ऐसे अनुभव शरीर पर गहरा असर छोड़ सकते हैं।

शरीर हमेशा तनाव की स्थिति में रहता है

विशेषज्ञों के मुताबिक, जब कोई बच्चा लंबे समय तक डर और असुरक्षा वाले माहौल में रहता है, तो उसका शरीर लगातार ‘फाइट या फ्लाइट’ स्थिति में रहने लगता है। इससे तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं। समय के साथ इसका असर शरीर के कई अंगों पर पड़ता है। यही कारण है कि आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ऑटोइम्यून बीमारियां, मोटापा, डिप्रेशन और नींद से जुड़ी परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है।

रिसर्च में भी मिले अहम सबूत

अमेरिका में हुई एसीई (ACE) स्टडी, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और कैसर परमानेंटे ने किया था, इसमें 17 हजार से अधिक लोगों को शामिल किया गया। इस रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, उपेक्षा, घरेलू तनाव या नशे से जुड़े माहौल का सामना किया था, उनमें आगे चलकर गंभीर बीमारियों का खतरा अधिक था। एक दूसरी रिसर्च में भी बचपन के मानसिक आघात और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संबंध पाया गया। इन अध्ययनों ने डॉक्टरों की सोच में बड़ा बदलाव लाया है और अब ट्रॉमा को केवल मानसिक नहीं, बल्कि शरीर को प्रभावित करने वाली जैविक स्थिति भी माना जा रहा है।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी विभिन्न रिसर्च और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। News1 India इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता है।इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या उपचार के लिए डॉक्टर से सलाह ले।

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