Depression in Youth: आज के समय में डिप्रेशन युवाओं के बीच तेजी से बढ़ती एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बनकर सामने आ रहा है। यह ऐसी स्थिति है जिसके लक्षण हमेशा स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते, लेकिन इसका प्रभाव व्यक्ति की पढ़ाई, करियर, रिश्तों और जीवन की गुणवत्ता पर गहरा असर डाल सकता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ते तनाव और सामाजिक दबाव के कारण युवाओं में डिप्रेशन के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
पीएसआरआई हॉस्पिटल की मनोवैज्ञानिक और काउंसलर अर्पिता कोहली के अनुसार, डिप्रेशन को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि कई बार इससे जूझ रहे लोग बाहर से सामान्य और खुश दिखाई देते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर भावनात्मक संघर्ष से गुजर रहे होते हैं।
युवाओं में डिप्रेशन क्यों बढ़ रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं में डिप्रेशन बढ़ने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। पढ़ाई का दबाव, बेहतर करियर बनाने की चिंता, आर्थिक असुरक्षा, रिश्तों में तनाव, सोशल मीडिया का प्रभाव और अकेलेपन की भावना मानसिक तनाव को बढ़ा सकते हैं। लगातार प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं का बोझ भी युवाओं को मानसिक रूप से प्रभावित कर रहा है।
डिप्रेशन के संकेत जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति में कई तरह के संकेत दिखाई दे सकते हैं। इनमें लगातार उदासी महसूस करना, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि कम होना, लोगों से दूरी बनाना, पढ़ाई या काम में ध्यान न लगना, थकान महसूस करना और भविष्य को लेकर निराशा जैसी भावनाएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो इसे सामान्य तनाव समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। गंभीर मामलों में व्यक्ति के मन में आत्महत्या जैसे खतरनाक विचार भी आ सकते हैं।
खुलकर बात करना है जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में आज भी कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं। इसी वजह से कई युवा अपनी परेशानियों को छिपाते रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक समस्याओं को कमजोरी नहीं समझना चाहिए। समय पर परिवार, दोस्तों या किसी विशेषज्ञ से बात करने से स्थिति में काफी सुधार हो सकता है।
कैसे रखें मानसिक स्वास्थ्य बेहतर?
मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाए रखने के लिए पर्याप्त नींद लेना, संतुलित आहार अपनाना, नियमित व्यायाम करना, योग और ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है। साथ ही अपनी भावनाओं को दबाने की बजाय भरोसेमंद लोगों के साथ साझा करना भी लाभदायक हो सकता है। यदि तनाव, चिंता या डिप्रेशन के लक्षण लगातार बने रहें तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।









