इजरायल में 2026 के आम चुनाव के बाद राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन और विपक्षी गुट के बीच सत्ता को लेकर खींचतान जारी है। चुनाव परिणामों में किसी एक गठबंधन को स्पष्ट और सर्वमान्य बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में सरकार बनाने का रास्ता मुश्किल होता दिखाई दे रहा है।
इस राजनीतिक गतिरोध के बीच नेतन्याहू विरोधी विपक्ष एक नया विकल्प तलाश रहा है। विपक्षी गठबंधन प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव कराने से जुड़ा विधेयक लाने पर विचार कर रहा है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता है।
विपक्ष का नया राजनीतिक दांव
‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्षी गुट देश में प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव कराने का प्रस्ताव तैयार करने पर विचार कर रहा है। इसके तहत मतदाता संसद के चुनाव से अलग सीधे प्रधानमंत्री के लिए भी वोट डाल सकेंगे।
इस व्यवस्था में प्रधानमंत्री पद का चुनाव जीतने वाला उम्मीदवार संसद में बहुमत के बिना भी अल्पमत सरकार बना सकेगा। विपक्ष का मानना है कि इससे मौजूदा राजनीतिक गतिरोध को खत्म करने में मदद मिल सकती है और नेतन्याहू की सत्ता में वापसी रोकने का रास्ता खुल सकता है।
अरब पार्टियों का समर्थन क्यों
इस प्रस्ताव के पीछे एक बड़ा राजनीतिक कारण अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भरता खत्म करना भी है। इजरायल में विपक्षी गठबंधन को कुल 67 सीटें मिली हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन के खाते में 53 सीटें आई हैं।
हालांकि विपक्ष की 67 सीटों में 48 सीटें यहूदी जायनिस्ट पार्टियों और 19 सीटें अरब गैर-जायनिस्ट पार्टियों की हैं। यहूदी विपक्षी नेताओं के लिए अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
इसी वजह से विपक्ष प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव का विकल्प तलाश रहा है। दिलचस्प बात यह है कि मार्च 2021 में ऐसी ही स्थिति बनने पर नेतन्याहू भी सीधे प्रधानमंत्री चुनाव कराने का प्रस्ताव आगे बढ़ा चुके हैं।
कानून बदलना आसान नहीं
इजरायल में प्रधानमंत्री का सीधा चुनाव कराने के लिए मौजूदा कानून में बदलाव करना होगा। इसके लिए ‘बेसिक लॉ- द गवर्नमेंट’ में संशोधन जरूरी है।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार प्रधानमंत्री को सरकार बनाने से पहले संसद यानी नेसेट में विश्वास मत हासिल करना होता है। इस नियम में बदलाव के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होगा।
इसलिए विपक्ष के सामने केवल प्रस्ताव लाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसे संसद में जरूरी समर्थन जुटाना भी होगा।
सड़कों पर भी शुरू हुई हलचल
राजनीतिक खींचतान के बीच इजरायल में यहूदी-अरब एकता के समर्थन में प्रदर्शन भी हो रहे हैं। ‘स्टैंडिंग टूगेदर’ संगठन ने तेल अवीव के हाबिमा स्क्वायर, यरुशलम के पेरिस स्क्वायर समेत कई शहरों में प्रदर्शनों का आह्वान किया है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बदलाव चाहने वाले यहूदी और अरब मतदाताओं ने मिलकर बहुमत का समर्थन दिया है। इसलिए अगली सरकार में दोनों समुदायों की भागीदारी होनी चाहिए। उनका कहना है कि अरब नागरिकों के वोटों का महत्व भी यहूदी नागरिकों के वोटों के बराबर है।
नवंबर में आगे की प्रक्रिया
चुनाव से जुड़ी औपचारिकताओं के बाद 4 नवंबर को अंतिम आधिकारिक परिणाम राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग को सौंपे जाने हैं। इसके बाद 10 नवंबर को नवनिर्वाचित संसद के शपथ ग्रहण का कार्यक्रम निर्धारित है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों का समर्थन लेगा या प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव का रास्ता अपनाएगा। आने वाले दिनों में इजरायल की राजनीति की दिशा इसी फैसले से तय हो सकती है।














