Rice Export Crisis: ईरान से जुड़े जारी संघर्ष का असर अब भारत के चावल निर्यात पर भी दिखाई देने लगा है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, खाड़ी देशों को होने वाले बासमती चावल के निर्यात में रुकावट आने से साल 2026 के शुरुआती चार महीनों में चावल निर्यात में हल्की गिरावट दर्ज की गई है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश माना जाता है। जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच भारत ने करीब 83.9 लाख मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 1.3 प्रतिशत कम रहा। अधिकारियों का कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर प्रीमियम बासमती चावल के निर्यात पर पड़ा है।
बढ़ती शिपिंग लागत बनी बड़ी वजह
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री रास्तों पर दबाव बढ़ गया है। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से माल पहुंचाने में देरी हो रही है। इसके साथ ही शिपिंग और बीमा का खर्च भी काफी बढ़ गया है। निर्यातकों के अनुसार, ईरान, इराक, कतर और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए भेजी जा रही चावल की खेप समय पर नहीं पहुंच पा रही है। मौजूदा हालात को देखते हुए कई खरीदार और विक्रेता नए सौदे करने से बच रहे हैं।
नई दिल्ली के एक निर्यातक ने कहा कि जब तक क्षेत्र में तनाव बना रहेगा, तब तक चावल का निर्यात सामान्य स्तर पर लौटना मुश्किल दिखाई दे रहा है।
बासमती बाजार पर सबसे ज्यादा असर
भारत से गैर-बासमती चावल मुख्य रूप से बांग्लादेश, बेनिन, आइवरी कोस्ट, गिनी और कैमरून जैसे देशों को भेजा जाता है। वहीं बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार सऊदी अरब, इराक, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पहले ईरान भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा खरीदार था। लेकिन अब सऊदी अरब इस मामले में आगे निकल चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्रीय तनाव के कारण खरीदारों का भरोसा कमजोर हुआ है और व्यापार की गति धीमी पड़ गई है।
अफ्रीकी बाजार से भी कमजोर हुई मांग
निर्यातकों का कहना है कि सिर्फ खाड़ी देश ही नहीं, बल्कि अफ्रीकी देशों से भी गैर-बासमती चावल की मांग कमजोर हुई है। आंध्र प्रदेश के काकीनाडा के एक व्यापारी ने बताया कि बढ़ती ढुलाई लागत और अनिश्चित माहौल का असर अब अफ्रीकी बाजारों में भी दिखाई देने लगा है। भारत वैश्विक चावल निर्यात में 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी रखता है। भारत अकेले कई बार थाईलैंड, वियतनाम और पाकिस्तान के कुल निर्यात से ज्यादा चावल दुनिया को बेचता है।
घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो इसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है। रिकॉर्ड उत्पादन के बाद इस साल भारत में चावल की कीमतों में पहले ही 5 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट देखी जा चुकी है। ऐसे में निर्यात में आई सुस्ती किसानों, व्यापारियों और पूरे चावल उद्योग के लिए चिंता का कारण बन सकती है।


