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R E L Fraud Case: सेबी की रिपोर्ट से मचा हड़कंप, राजेश एक्सपोर्ट्स पर फर्जी कारोबार और निवेशकों को भारी नुकसान का आरोप

REL Scam Paper Business: भारतीय कॉरपोरेट दुनिया में अब तक सत्यम और पीएनबी-नीरव मोदी जैसे घोटालों की चर्चा होती रही है। लेकिन जून 2026 में सामने आए राजेश एक्सपोर्ट्स मामले ने इन सभी मामलों को पीछे छोड़ दिया है। सेबी के अंतरिम आदेश में कंपनी और उसके प्रमोटर राजेश मेहता पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि कंपनी ने केवल कागजों पर ही ₹15.15 लाख करोड़ का कारोबार दिखा दिया।

कागजों पर बनाया गया करोड़ों का कारोबार

सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्शने के आदेश के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच कंपनी के कुल राजस्व का 97 से 99.8 प्रतिशत हिस्सा कथित रूप से फर्जी था। जांच में सामने आया कि इस पूरे नेटवर्क में स्विट्जरलैंड स्थित वैलकैम्बी गोल्ड रिफाइनरी की अहम भूमिका थी।

कंपनी ने स्विस गोपनीयता कानूनों का हवाला देते हुए कई जरूरी जानकारियां उपलब्ध नहीं कराईं। आरोप है कि बिना सोने की वास्तविक खरीद-बिक्री के केवल चालान और दस्तावेज़ों के आधार पर स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, दुबई और भारत के बीच कारोबार दिखाया गया। एक संदिग्ध कंपनी ‘अफ्लुएंस शेयर्स एंड स्टॉक्स’ के साथ भी बिना स्पष्ट समझौते के ₹11,488 करोड़ का लेनदेन दिखाया गया।

इतना कारोबार, फिर भी कम मुनाफा

शेयर बाजार में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा कि इतनी बड़ी गोल्ड कंपनी का मुनाफा हमेशा एक प्रतिशत से भी कम क्यों रहता है। सेबी की जांच में इसका संभावित कारण भी सामने आया है। जांच एजेंसी का कहना है कि कंपनी कथित रूप से ट्रांसफर प्राइसिंग के जरिए अपना लाभ विदेशी सहयोगी कंपनियों में स्थानांतरित कर देती थी।

इससे भारत में कर का बोझ कम हो जाता था। इसके अलावा आरोप है कि प्रमोटर राजेश मेहता ने अपनी निजी शेयर ट्रेडिंग के लिए कंपनी के ₹339 करोड़ सीधे अपने खातों में ट्रांसफर कराए। यह सब बिना बोर्ड की मंजूरी और शेयरधारकों की जानकारी के हुआ।

शिकायत के बाद भी कार्रवाई में देरी

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बावजूद कार्रवाई इतनी देर से क्यों हुई। जानकारी के अनुसार, 11 मार्च 2024 को एक निवेशक ने सेबी को लिखित शिकायत भेजी थी। इसके बाद अक्टूबर 2024 में जांच टीम बनाई गई और दिसंबर में फोरेंसिक ऑडिटर नियुक्त किए गए।

वहीं, दूसरी एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। डीआरआई समय रहते कथित ओवर-इनवॉइसिंग की जांच नहीं कर सकी। आयकर विभाग विदेशी कंपनियों से जुड़ी जानकारी हासिल करने में तेजी नहीं दिखा पाया। ईडी को मूल अपराध घोषित होने का इंतजार करना पड़ा, जबकि एसएफआईओ ने शुरुआती दौर में इसे केवल लेखांकन संबंधी गड़बड़ी माना।

निवेशकों को हुआ भारी नुकसान

जांच रिपोर्ट सामने आने से पहले ही कंपनी के शेयरों में 45 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी थी। इसका सीधा असर लाखों निवेशकों पर पड़ा। एलआईसी समेत रिटेल निवेशकों के लगभग ₹12,726 करोड़ बाजार मूल्य के रूप में प्रभावित हुए। वहीं, कैनरा बैंक पहले ही कंपनी के ₹509 करोड़ के कर्ज को तनावग्रस्त संपत्ति घोषित कर चुका है।

कंपनी ने आरोपों को बताया गलत

राजेश एक्सपोर्ट्स के चेयरमैन राजेश मेहता ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि सेबी ने राजस्व और सकल लाभ के आंकड़ों को लेकर गलतफहमी पैदा की है। उन्होंने दावा किया कि ₹15.5 लाख करोड़ का आंकड़ा पांच वर्षों का कुल योग है, न कि किसी एक साल का कारोबार।

हालांकि, सेबी का कहना है कि जांच के दौरान कंपनी ने अपने ईआरपी सिस्टम तक फोरेंसिक ऑडिटरों को पूरी पहुंच नहीं दी। फिलहाल सेबी ने राजेश मेहता की शेयर बाजार में ट्रेडिंग पर अंतरिम रोक लगा दी है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि ईडी, एसएफआईओ और आयकर विभाग आगे क्या कदम उठाते हैं और क्या यह मामला आपराधिक कार्रवाई तक पहुंचेगा।

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