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नई दिल्ली:देशभर के हस्तशिल्पियों और कारीगरों को अपनी कला और उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए प्रसिद्ध दिल्ली हाट लंबे समय से एक महत्वपूर्ण मंच देता रहा है। यहां कम किराए पर दुकानें उपलब्ध कराने का उद्देश्य स्थानीय कला और हस्तशिल्प को बढ़ावा देना और कारीगरों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना था। लेकिन अब दुकानों के किराए में भारी बढ़ोतरी ने कारीगरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
चार गुना तक बढ़ा किराया
कारीगरों के अनुसार, वर्ष 2024 और 2025 में 8X8 वर्ग फीट की दुकानों का किराया लगभग 60 हजार रुपये था। लेकिन अप्रैल से जून 2026 के लिए जारी नई निविदा में यही किराया बढ़ाकर करीब 2.03 लाख रुपये कर दिया गया। जीएसटी जोड़ने के बाद यह राशि लगभग 2.40 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
इस भारी बढ़ोतरी का असर साफ दिखाई दे रहा है। कुल 38 व्यावसायिक दुकानों में से 16 दुकानों के लिए किसी ने आवेदन तक नहीं किया। यानी लगभग 42 प्रतिशत दुकानें खाली रह गईं।
किराया निकालना भी मुश्किल
मिर्जापुर के ब्रास आइटम शिल्पकार अजीत कुमार शुक्ला, जो पिछले कई वर्षों से यहां दुकान लगाते आ रहे हैं, बताते हैं कि पहले गर्मियों में किराया 60 हजार रुपये और सर्दियों में लगभग 1.10 लाख रुपये तक होता था। अब 2.40 लाख रुपये प्रतिमाह किराया देना बेहद मुश्किल हो गया है।
वहीं कासगंज के कारीगर जितेंद्र कुमार, जो आर्टिफिशियल ज्वेलरी की दुकान लगाते हैं, कहते हैं कि इतना अधिक किराया देने के बावजूद उन्हें खुद भी 30 रुपये का टिकट लेकर दिल्ली हाट में प्रवेश करना पड़ता है।
अतिरिक्त खर्चों ने बढ़ाई चिंता
कारीगरों का कहना है कि केवल दुकान का किराया ही नहीं, बल्कि बिजली बिल, मेज-कुर्सी का शुल्क और अन्य खर्च भी अलग से देने पड़ते हैं। औसतन छह हजार रुपये तक बिजली का बिल आता है। ऐसे में छोटे और मध्यम स्तर के शिल्पकारों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो रहा है।
अधिकारियों से लगाई गुहार
कारीगरों और शिल्पकारों ने दिल्ली हाट प्रबंधन और दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम के अधिकारियों से किराया कम करने की मांग की है। हालांकि अब तक इस पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया है।
अलग-अलग दुकानों के अलग किराए
दिल्ली हाट में विभिन्न आकार की दुकानें उपलब्ध हैं। इस बार इनका किराया 2.03 लाख रुपये से लेकर 6.38 लाख रुपये प्रतिमाह तक तय किया गया है।
कारीगरों में नाराजगी
कारीगरों का कहना है कि दिल्ली हाट जैसे मंच का उद्देश्य छोटे हस्तशिल्पियों को अवसर देना था, लेकिन अब बढ़ती लागत के कारण यहां दुकान लगाना उनके लिए कठिन होता जा रहा है। उनका मानना है कि यदि किराए में राहत नहीं दी गई, तो भविष्य में और अधिक दुकानें खाली रह सकती हैं।


