Kids Social Media Ban: कई देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने के लिए उम्र की पाबंदी, अकाउंट वेरिफिकेशन और पैरेंटल कंट्रोल जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि, सिर्फ बैन या उम्र की सीमा तय कर देने से बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पूरी तरह खत्म नहीं होती। तकनीक की मदद से कई बार वे इन प्रतिबंधों को चकमा देने की कोशिश करते हैं।
VPN से बदल सकती है लोकेशन
बैन से बचने के लिए VPN का इस्तेमाल एक आम तरीका है। VPN इंटरनेट कनेक्शन को दूसरे सर्वर के जरिए रूट करता है, जिससे वेबसाइट या ऐप को यूजर की वास्तविक लोकेशन का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, कई ऑनलाइन सेवाएं VPN ट्रैफिक को पहचानने की तकनीक भी इस्तेमाल करती हैं।
उम्र की जांच बनी बड़ी चुनौती
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उम्र की पुष्टि के लिए जन्मतिथि, पहचान दस्तावेज, सेल्फी आधारित अनुमान और डिजिटल वेरिफिकेशन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ जन्मतिथि दर्ज कराने से गलत उम्र बताकर अकाउंट बनाने की संभावना बनी रहती है। इसलिए प्लेटफॉर्म अधिक प्रभावी एज वेरिफिकेशन तकनीक पर काम कर रहे हैं।
दूसरे के अकाउंट से लॉगिन
कई बार बच्चे परिवार के किसी बड़े सदस्य के अकाउंट का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में केवल अकाउंट की उम्र देखकर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में डिवाइस कौन चला रहा है। इसलिए डिवाइस, लॉगिन पैटर्न और इस्तेमाल के तरीके जैसे संकेत भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ऐप हटाने के बाद ब्राउजर का रास्ता
फोन से सोशल मीडिया ऐप डिलीट करने के बावजूद उसकी वेबसाइट ब्राउजर से इस्तेमाल की जा सकती है। अगर नेटवर्क स्तर पर वेबसाइट को ब्लॉक नहीं किया गया है, तो केवल ऐप हटाना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता।
पैरेंटल कंट्रोल कितना कारगर?
पैरेंटल कंट्रोल के जरिए माता-पिता ऐप लिमिट, स्क्रीन टाइम, वेबसाइट और कंटेंट फिल्टर जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, तकनीकी प्रतिबंधों के साथ बच्चों को ऑनलाइन प्राइवेसी, इंटरनेट सुरक्षा और सोशल मीडिया के संभावित खतरों के बारे में समझाना भी जरूरी है।




