Allahabad HC Questions Over Bulldozer Action:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर एक बार फिर सरकार से कड़ी टिप्पणियाँ की हैं। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवंबर 2024 में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन देश के सबसे बड़े राज्य में हो रहा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में स्पष्ट कहा था कि बुलडोजर का प्रयोग दंडात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
किस मामले में मांगा गया जवाब
हाईकोर्ट के समक्ष यह मामला हमीरपुर जिले का है, जहाँ एक परिवार ने याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि उनके रिश्तेदार के खिलाफ़ FIR दर्ज होने के बाद प्रशासन उनकी संपत्ति को बुलडोजर से गिराने की सोच रहा है। इस याचिका में पिता, माता और बेटे ने कहा कि उनके घर और अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुँच सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिविजन बेंच, जिसमें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन शामिल हैं, ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या उसे किसी आरोपी के घर को ध्वस्त करने का अधिकार है, या उसकी जिम्मेदारी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। कोर्ट ने कहा कि सीधे अपराध के बाद ध्वस्तीकरण एक “कार्यालयिक विवेक का विकृत प्रयोग” हो सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि दंडात्मक ध्वस्तीकरण को कानून के शासन के अंतर्गत स्वीकार्य नहीं माना गया है। केवल न्यायपालिका के पास ही दोषी को सजा देने का अधिकार है, न कि कार्यपालक (Executive) को। यही कारण है कि कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि क्या बुलडोजर कार्रवाई का प्रयोग निष्पक्ष और वैध प्रक्रिया के अन्तर्गत किया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि केवल नोटिस जारी किए गए हैं और किसी भी ध्वस्तीकरण से पहले याचिकाकर्ताओं को कानूनी प्रक्रिया का पूरा मौका दिया जाएगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि बिना उचित सुनवाई और प्रक्रिया अपनाए कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
क्यों FIR के बाद ही ध्वस्तीकरण नोटिस जारी होते है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वह कई ऐसे मामलों से अवगत है जहाँ FIR के तुरंत बाद ही ध्वस्तीकरण नोटिस जारी किए जाते हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि दंडित करने का उद्देश्य सीधे बुलडोज़र का उपयोग करना है, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत है। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका के निर्देशों का पालन करना राज्य
बताई सरकार की जिम्मेदारी
सरकार की जिम्मेदारी है, विशेष रूप से जब मूलभूत अधिकारों जैसे अनुच्छेद 14 (कानून के सामने समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सवाल हो।
हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 के लिए निर्धारित की है, जहाँ वह इस मुद्दे पर विस्तृत तर्कों को सुनेगा और आगे की दिशा तय करेगा।









