Uttar Pradesh Division Debate:देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश एक बार फिर बंटवारे की बहस के केंद्र में है। 80 लोकसभा सीटों और 75 जिलों वाले इस बड़े प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग अब सिर्फ राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोगों की बातचीत का भी हिस्सा बन गई है। खासतौर पर पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की आवाज एक बार फिर तेज होती नजर आ रही है।
समर्थकों का कहना है कि इतना बड़ा राज्य होने के कारण प्रशासन और विकास दोनों ही प्रभावित होते हैं। छोटे राज्य बनने से शासन ज्यादा प्रभावी होगा और स्थानीय जरूरतों पर तेजी से काम हो सकेगा।
क्यों उठी अलग पूर्वांचल की मांग
बीते कुछ महीनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भाजपा के कुछ नेताओं ने छोटे राज्य की जरूरत पर बयान दिए थे। अब यही मांग पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल से भी मजबूती से उठने लगी है। अमेठी में हुए एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह और पूर्व प्राविधिक शिक्षा मंत्री डॉ. अमीता सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक पूर्वांचल को अलग राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक उसका समुचित विकास संभव नहीं है। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह मुद्दा केवल राजनीति का नहीं, बल्कि जनता की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। लोगों का मानना है कि पश्चिमी यूपी की तुलना में पूर्वी यूपी आज भी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मामले में पीछे है।
छोटा राज्य, बेहतर प्रशासन का तर्क
पूर्वांचल राज्य के समर्थकों का कहना है कि छोटे राज्य बनने से प्रशासनिक पकड़ मजबूत होगी। स्थानीय समस्याओं को समझना और उनका समाधान निकालना आसान होगा। इसके अलावा विकास योजनाओं का लाभ भी सीधे जनता तक पहुंचेगा।
उनका तर्क है कि बड़े राज्य में कई बार दूर-दराज के इलाकों की आवाज राजधानी तक नहीं पहुंच पाती, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ता है।
क्या यूपी का बंटवारा संभव है:
संवैधानिक प्रक्रियाभारत के संविधान में राज्य के बंटवारे की प्रक्रिया साफ तौर पर तय है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 3 को समझना जरूरी है।
सबसे पहले, किसी राज्य को बांटने या नया राज्य बनाने का अधिकार केवल संसद के पास होता है। इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। राष्ट्रपति इस प्रस्ताव को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास भेजते हैं, ताकि वहां इस पर चर्चा हो सके। हालांकि, राज्य विधानसभा की राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती। यानी अगर विधानसभा प्रस्ताव के खिलाफ भी हो, तब भी संसद कानून पास कर सकती है। इस कानून को पारित करने के लिए संसद में साधारण बहुमत ही काफी होता है।
इतिहास में भी उठ चुकी है यह मांग
यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश के बंटवारे की बात हो रही है। साल 2000 में यूपी से अलग होकर उत्तराखंड राज्य बना था। इसके बाद साल 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने यूपी को चार हिस्सों पूर्वांचल, पश्चिमांचल, बुंदेलखंड और अवध में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा से पास कराया था। हालांकि, उस समय केंद्र सरकार की मंजूरी न मिलने के कारण यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।









