कुछ ऐसी है पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल की कहानी, जिनके हाथों पर रही कांग्रेस के ‘पॉवर हाउस’ की चाबी

दिग्गज राजनेता, महान जनसेवक, पूर्व मंत्री व तीन बार सांसद रहे श्रीप्रकाश जायसवाल अब इस दुनिया में नहीं रहे। 81 वर्ष उम्र में श्रीप्रकाश जायसवाल ने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही शनिवार को अभिनेता रजा मुराद अंतिम दर्शन को पहुंचे।

कानपुर। दिग्गज राजनेता, महान जनसेवक, पूर्व मंत्री व तीन बार सांसद रहे श्रीप्रकाश जायसवाल अब इस दुनिया में नहीं रहे। 81 वर्ष उम्र में श्रीप्रकाश जायसवाल ने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही शनिवार को अभिनेता रजा मुराद अंतिम दर्शन को पहुंचे। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने श्रीप्रकाश जायसवाल के छोटे बेटे गौरव जायसवाल से बात की। उनका अंतिम संस्कार 30 नवंबर को कानपुर के भैरवघाट में किया गया। कांग्रेस के दिग्गज नेता की अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा। लोगों ने नम आखों से श्रीप्रकाश जायसवाल के अंतिम विदाई दी।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता जायसवाल का शुक्रवार को कानपुर में हृदय गति रुकने से निधन हो गया। जायसवाल की हालत बिगड़ने पर उन्हें शाम को पहले किदवई नगर स्थित एक नर्सिंग होम ले जाया गया और फिर कार्डियोलॉजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने एक्स पर श्रीपकाश जायसवाल के निधन पर भावुक पोस्ट लिखी। राहुल गांधी ने उनके बेटे से बात की। प्रियंका गांधी ने भी बेटे से बात की। कांग्रेस के अलावा बीजेपी के नेताओं ने भी श्रीप्रकाश जायसवाल के निधन पर शोक प्रकट किया।

श्रीप्रकाश जायसवाल का जन्म 14 सितंबर 1944 को कानपुर में हुआ। जायसवाल ने प्रारंभिक शिक्षा बीएनएसडी इंटर कॉलेज से पूरी की। 28 अप्रैल 1967 को उन्होंने माया रानी से शादी की। उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। जायसवाल ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत नगर स्तर से की थी। 1989 में वे कानपुर नगर निगम के मेयर चुने गए, जहां से उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। इसके बाद वह 1999, 2004 और 2009 में लगातार तीन बार कानपुर से लोकसभा सांसद बने। यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीप्रकाश जायसपाल यूपीए सरकार में दो बार मंत्री रहे।

मनमोहन सिंह सरकार में श्रीप्रकाश जायसवाल को लगातार दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। 2004 से लेकर 2009 तक वह गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे। 2011 से लेकर 2014 तक जायसवाल केंद्रीय कोयला मंत्री के पद रहे। कानपुर में जायसवाल का जनाधार बेहद मजबूत था। हर हफ्ते जनता दरबार लगाना, स्वास्थ्य शिविर-एंबुलेंस सेवा जैसी आम आदमी से जुड़ी पहलें करने की वजह से वे शहर के लोगों के बीच खासे लोकप्रिय रहे। स्थानीय लोग उन्हें सहज, मिलनसार और जमीन से जुड़े नेता के रूप में याद करते हैं। सौरभ श्रीवास्तव बताते हैं श्रीप्रकाश जायसवाल असल में कांग्रेस के पितामह थे। जायसवाल के हाथों पर करीब 35 सालों तक कांग्रेस के पॉवरहाउस यानि तिलक हॉल की चाबी रही।

सौरभ श्रीवास्तव बताते हैं वजूद के लिहाज से धरती कांग्रेस के लिए बेशक बंजर-बेजार सी नजर आती हो। मगर, जब भी कांग्रेस के 140 साल के इतिहास के पन्ने पलटे जाएंगे तो ’कानपुर’ कई जगह उभरा नजर आएगा। कांग्रेस को पूरी दम देने वाला ये शहर कभी प्रदेश में कांग्रेस का ’पावर हाउस’ हुआ करता था। इसी पॉवर हाउस की कमान श्रीप्रकाश जायसवाल के हाथों में रही। कांग्रेस भले ही यूपी में मजबूत कम हो, लेकिन पार्टी का संगठन आज भी जिले में बीजेपी से बड़ा है। इस संगठन को खड़ा करने में अहम रोल जायसवाल ने निभाया। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की लहर के चलते भले ही जायसवाल चुनाव हार गए, लेकिन उनकी पकड़ अब भी ज्यों की त्यों मौजूद है।

श्रीप्रकाश जायसवाल जब केंद्रीय मंत्री थे तब कानपुर के उनके समर्थक सीधे उनके कार्यालय में पहुंचकर वहां रखे फोन का भी इस्तेमाल कर लेते थे। इसी तरह उन्होंने एक बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि शनिवार और रविवार को उनकी ड्यूटी दिल्ली या फिर किसी दूसरी जगह न लगाई जाए। इन दोनों दिनों में वह अपने कानपुर के लोगों के बीच रहते हैं। वरिष्ठ नेता शंकरदत्त मिश्रा बताते हैं कि पार्टी कार्यालय तिलक हॉल में बैठना उनके लिए नशा था। यदि कानपुर में रहते थे, तो एक-दो बार तिलक हॉल अवश्य ही आते थे। सौरभ श्रीवास्तव बताते हैं कि असल में श्रीप्रकाश जायसवाल का असली घर कांग्रेस का पार्टी दफ्तर तिलक हॉल ही था। वह कांग्रेस कार्यकर्ताओं को तिलक हॉल के बारे में बताया करते।

सौरभ श्रीवास्तव बताते हैं कि जायसवाल हमलोगों से कहा करते थे कि इसी तिलक हॉल पर महात्मा गांधी रूका करते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी भी तिलक हॉल पर बैठकर कांग्रेस के संगठन को धार दिया करती थीं। राजीव गांधी से लेकर राहुल गांधी भी तिलक हॉल में आते थे। सौरभ बताते हैं कि जायसवाल को दिल में तिलक हॉल बसता था। सौरभ एक और घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार वह सुगंध एवं सरस केंद्र, फजलगंज में पौधरोपण के लिए आए थे। इस दौरान उन्होंने एक चंदन का पौधा लगाया था। वह अक्सर फोन करके यहां के अधिकारी डॉ. भक्ति विजय शुक्ल से पूछते रहते थे कि उनका पौधा बढ़ रहा है या नहीं। यह भी बोलते देखते रहना सूखने न पाए।

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का 1989 में कानपुर के पहले मेयर के रूप में सत्तासीन होना कांग्रेसियों और शहरवासियों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। साथ ही ढाई वर्ष में ही मेयर की कुर्सी को खुद छोड़ना भी चकित करने वाला रहा। श्रीप्रकाश ने मेयर की कुर्सी क्यों छोड़ी इसका राज उनके जाने पर राज ही रह गया। उनके मेयर के कार्यकाल में कांग्रेस सभासद रहे अनिल वाजपेयी भुल्लड़ बताते हैं कि ढाई साल के लिए जब कांग्रेस की ओर से सरदार महेंद्र सिंह को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया तब उनके लिए सभासदों के घर-घर जाकर उन्होंने बहुमत भी जुटाने का काम किया। उस समय सभासद ही मेयर को चुनते थे। लोग श्रीप्रकाश से किस कदर घुले मिले थे, इसका एक और उदाहरण है।

Exit mobile version