NTA Reform: NEET और दूसरी प्रवेश परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर केंद्र सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर है। छात्रों के विरोध-प्रदर्शन और परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी NTA में व्यापक सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इस काम के लिए नंदन नीलेकणी को अहम जिम्मेदारी दी गई है। खास बात यह है कि नीलेकणी बीजेपी के नेता या सरकार के करीबी राजनीतिक चेहरे नहीं हैं। वह इंफोसिस के सह-संस्थापक और देश के प्रमुख टेक्नोक्रेट के रूप में पहचाने जाते हैं। कभी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके नीलेकणी की नियुक्ति को अब केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
कांग्रेस से रिश्ता
नंदन नीलेकणी भारतीय आईटी उद्योग के सबसे चर्चित नामों में शामिल हैं। इंफोसिस की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही है। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें UIDAI की जिम्मेदारी सौंपी थी। आधार परियोजना को देशभर में लागू करने में नीलेकणी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। साल 2014 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और बेंगलुरु दक्षिण लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के अनंत कुमार के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। अब करीब एक दशक बाद मोदी सरकार ने NTA सुधार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए उन्हीं पर भरोसा जताया है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार उनके राजनीतिक अतीत से ज्यादा उनके तकनीकी और प्रशासनिक अनुभव को महत्व दे रही है।
तकनीक पर फोकस
NTA को लेकर सबसे बड़ी चिंताएं परीक्षा की विश्वसनीयता और डिजिटल सुरक्षा से जुड़ी हैं। पेपर लीक, साइबर हमले, फर्जीवाड़े और संगठित नकल जैसे आरोपों ने परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में सरकार को ऐसे विशेषज्ञ की जरूरत थी, जिसे बड़े स्तर पर डिजिटल सिस्टम तैयार करने और उसे संचालित करने का अनुभव हो। आधार परियोजना के कारण नीलेकणी के पास बड़े पैमाने पर डेटा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी व्यवस्था को संभालने का अनुभव है। ऐसे में उनकी भूमिका केवल परीक्षा प्रक्रिया सुधारने तक सीमित नहीं मानी जा रही है, बल्कि पूरी डिजिटल परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने पर भी जोर हो सकता है।
सुरक्षा का नजरिया
सुधार समिति की संरचना भी सरकार की प्राथमिकताओं को काफी हद तक स्पष्ट करती है। इसमें पूर्व इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी और पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल जैसे विशेषज्ञों की भूमिका महत्वपूर्ण है। वरिष्ठ नौकरशाह अमृत लाल मीणा भी बड़े स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन का अनुभव रखते हैं। समिति में तकनीक, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष विज्ञान, खुफिया तंत्र, शिक्षा और प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों को शामिल करना बताता है कि सरकार परीक्षा सुधार को केवल शिक्षा का विषय नहीं मान रही है। इसके पीछे डिजिटल सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और देश की परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने का व्यापक लक्ष्य भी दिखाई देता है।
बड़ा राजनीतिक संदेश
नीलेकणी की नियुक्ति का सबसे अहम पहलू इसका राजनीतिक संदेश है। पिछले कुछ समय से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल NTA और NEET को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में सुधार की जिम्मेदारी एक ऐसे टेक्नोक्रेट को देना, जो कभी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुका हो, सरकार की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। इससे सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि परीक्षा सुधार को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि संस्थागत और तकनीकी नजरिए से देखा जा रहा है। दूसरी ओर, विपक्ष के लिए भी इस नियुक्ति पर केवल राजनीतिक आधार पर सवाल उठाना आसान नहीं होगा, क्योंकि नीलेकणी की पहचान उनकी तकनीकी विशेषज्ञता और डिजिटल क्षेत्र में योगदान के लिए है।
अब असली चुनौती
समिति से उम्मीद की जा रही है कि वह सिर्फ पेपर लीक रोकने तक सीमित नहीं रहेगी। डिजिटल परीक्षा प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाना, साइबर सुरक्षा मजबूत करना, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता बनाए रखना, परीक्षा केंद्रों की निगरानी बढ़ाना और जिम्मेदारी तय करने जैसी व्यवस्थाओं पर भी सुझाव आ सकते हैं। हालांकि, समिति का गठन केवल पहला कदम है। असली चुनौती उसकी सिफारिशों को जमीन पर लागू करने की होगी। भारत जैसे बड़े देश में करोड़ों छात्रों के लिए पारदर्शी, सुरक्षित और भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली तैयार करना आसान नहीं है। फिर भी, नंदन नीलेकणी को जिम्मेदारी देकर सरकार ने साफ संकेत दिया है कि वह NTA सुधार को सिर्फ मौजूदा विवाद से निकलने का रास्ता नहीं, बल्कि लंबे समय के संस्थागत बदलाव के रूप में आगे बढ़ाना चाहती है।


