इस साल मौसम ने लगातार अपना रौद्र रूप दिखाया है। कहीं भीषण गर्मी और हीटवेव ने लोगों को परेशान किया, तो कहीं मूसलाधार बारिश और फ्लैश फ्लड ने तबाही मचाई। अब अल नीनो को लेकर नई चिंता सामने आ रही है। प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान बढ़ने से मौसम का वैश्विक संतुलन प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, इसे लेकर अलग-अलग मौसम मॉडल के अनुमान अलग हो सकते हैं और आने वाले महीनों की स्थिति लगातार बदल सकती है।
अल नीनो का असर
अल नीनो तब बनता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर सिर्फ प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में हवा, बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से मौसम वैज्ञानिक इसकी निगरानी करते हैं। इस बार समुद्र की सतह के साथ गहरे पानी में भी असामान्य गर्मी की बात सामने आई है, जिससे मजबूत अल नीनो की आशंका बढ़ी है।
तापमान ने बढ़ाई चिंता
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, नीनो 3.4 इंडेक्स में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंचा है। जुलाई में यह अंतर करीब 2 डिग्री सेल्सियस बताया गया, जबकि बाद की साप्ताहिक रीडिंग में यह बढ़कर 2.2 से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इसके अलावा जुलाई और अगस्त के दौरान समुद्र की गहराई में भी सामान्य से कई डिग्री ज्यादा तापमान दर्ज किए जाने का दावा किया गया। समुद्र में जमा यह अतिरिक्त गर्मी अल नीनो को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
भारत पर खतरा
भारत के लिए मजबूत अल नीनो चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि इसका असर मानसून पर पड़ सकता है। कमजोर या अनिश्चित बारिश का सीधा प्रभाव खेती और जल संसाधनों पर पड़ता है। बारिश में कमी होने पर फसलों को नुकसान, बांधों और जलाशयों में घटता पानी तथा सिंचाई और पेयजल की समस्या बढ़ सकती है। हालांकि, किसी एक मौसम घटना के आधार पर पूरे मानसून या सर्दियों का सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं होता। मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमानों को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए।
सर्दी होगी कमजोर?
अल नीनो के मजबूत होने की स्थिति में भारत के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना बढ़ सकती है। खासकर उत्तर और मध्य भारत में सर्दियों की तीव्रता पर इसका असर पड़ने की चर्चा होती रही है। ऐसे में दिसंबर और जनवरी में सामान्य से कम ठंड पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में सर्दी आएगी ही नहीं या पूरे देश में हीटवेव जैसी स्थिति बनेगी। स्थानीय मौसम प्रणालियां भी तापमान और ठंड को प्रभावित करती हैं।
कहीं सूखा, कहीं बाढ़
मजबूत अल नीनो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिल्कुल अलग मौसम पैदा कर सकता है। कुछ क्षेत्रों में सूखा, पानी की कमी और जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे इलाकों में अत्यधिक बारिश और अचानक बाढ़ की स्थिति बन सकती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे वैश्विक मौसम के लिए महत्वपूर्ण पैटर्न मानते हैं। इसके साथ ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भी चिंता बढ़ाता है। समुद्र और वातावरण पहले से गर्म होने के कारण किसी प्राकृतिक मौसमी बदलाव के दौरान चरम मौसम की घटनाएं ज्यादा गंभीर हो सकती हैं।








