Market in Pressure, भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिका की व्यापार टैरिफ नीति, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली ने बाजार की धारणा कमजोर कर दी। कारोबार के दौरान सेंसेक्स एक समय 916.96 अंक तक टूटकर 75,474.43 के स्तर पर पहुंच गया। हालांकि, बाद में कुछ रिकवरी के बावजूद बीएसई सेंसेक्स 331.62 अंक यानी 0.43 प्रतिशत गिरकर 76,059.77 पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 में 102.15 अंक यानी 0.43 प्रतिशत की गिरावट रही और यह 23,767.45 के स्तर पर बंद हुआ। लगातार पांच सत्रों की गिरावट में सेंसेक्स 2,091.68 अंक और निफ्टी 566.85 अंक कमजोर हो चुका है।
तनाव का असर
बाजार में गिरावट की बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव भी रहा। निवेशकों को आशंका है कि अगर क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहा, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में निवेशक जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी बनाकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इसका सीधा दबाव उभरते बाजारों के शेयरों पर दिखाई देता है। इसके अलावा, अमेरिकी व्यापार टैरिफ को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ाई है। निवेशकों को डर है कि लंबे समय तक चलने वाले व्यापार प्रतिबंधों से वैश्विक मांग, सप्लाई चेन और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
कच्चे तेल का दबाव
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। हालिया कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत कुछ समय के लिए 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी। बाद में इसमें करीब 3.66 प्रतिशत की गिरावट आई और यह लगभग 96.98 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, लेकिन कीमतें अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। महंगा कच्चा तेल भारत का आयात बिल बढ़ा सकता है, चालू खाता घाटे पर दबाव डाल सकता है और रुपये को कमजोर कर सकता है। साथ ही, इससे महंगाई बढ़ने की आशंका भी रहती है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इसका असर कंपनियों की कमाई और देश की आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है।
FII की भारी बिकवाली
विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया है। एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, एफआईआई ने पिछले कारोबारी सत्र में भारतीय इक्विटी बाजार से 2,999.23 करोड़ रुपये की निकासी की। कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच विदेशी पूंजी का लगातार बाहर जाना बाजार की अस्थिरता को और बढ़ा रहा है। शुक्रवार को कई बड़े और भारी वजन वाले शेयरों में बिकवाली देखने को मिली। एटरनल, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, भारती एयरटेल, एशियन पेंट्स, इन्फोसिस और एचडीएफसी बैंक प्रमुख गिरावट वाले शेयरों में शामिल रहे। इन्फोसिस में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट रही, जबकि कंपनी के राजस्व वृद्धि अनुमान में बदलाव के बाद आईटी क्षेत्र की संभावनाओं को लेकर भी निवेशकों की चिंता बढ़ी।
सेक्टरों का हाल
शुक्रवार को ऑटो इंडेक्स में 0.96 प्रतिशत की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा टेलीकॉम में 0.90 प्रतिशत, पावर में 0.67 प्रतिशत, कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी में 0.65 प्रतिशत, ऑयल एंड गैस में 0.65 प्रतिशत, रियल्टी में 0.54 प्रतिशत, मेटल में 0.50 प्रतिशत और एनर्जी इंडेक्स में 0.39 प्रतिशत की कमजोरी रही। हालांकि, कुछ क्षेत्रों ने बाजार की व्यापक कमजोरी के बीच बेहतर प्रदर्शन किया। फोकस आईटी इंडेक्स 1.30 प्रतिशत और आईटी इंडेक्स 0.66 प्रतिशत चढ़ा। पीएसयू बैंक, इंश्योरेंस और एफएमसीजी जैसे सेक्टर भी बढ़त के साथ बंद हुए। मिडकैप और स्मॉलकैप सेगमेंट में भी सीमित मजबूती दिखाई दी।
बाजार की दशा निवेशकों के रुख पर निर्भर
अब निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों, एफआईआई निवेश और कंपनियों के आगामी तिमाही नतीजों पर रहेगी। अमेरिकी व्यापार नीति से जुड़ी किसी भी नई घोषणा का असर भी बाजार पर पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक स्थिति में स्पष्टता आने तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। हालांकि, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बाजार की गिरावट मजबूत बुनियादी कंपनियों में निवेश के अवसर भी पैदा कर सकती है। फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक संकेतों और निवेशकों के जोखिम लेने के रुख पर निर्भर रहने वाली है।








