Islamic NATO: मध्य पूर्व में बढ़ते सुरक्षा संकट और लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर बढ़ते हमलों के बीच सऊदी अरब ने एक नए बहुराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा गठबंधन की घोषणा की है। इसे कई विश्लेषक “इस्लामिक NATO” की संज्ञा दे रहे हैं। इस पहल में पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, सूडान और जिबूती समेत 14 मुस्लिम देशों ने समर्थन दिया है। इस गठबंधन का उद्देश्य बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य, लाल सागर और अदन की खाड़ी में समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसका मुख्यालय रियाद में होगा और इसकी अगुवाई सऊदी अरब करेगा।
क्यों पड़ी जरूरत
हाल के महीनों में यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा जहाजों पर हमलों और समुद्री नाकेबंदी की घोषणाओं ने क्षेत्र की सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी है। ऐसे हालात में सऊदी अरब ने सहयोगी देशों के साथ मिलकर संयुक्त समुद्री गश्त, खुफिया जानकारी साझा करने और व्यापारिक मार्गों की रक्षा के लिए यह सुरक्षा ढांचा तैयार किया है। आधिकारिक तौर पर इसे किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं बताया गया, बल्कि इसे सामूहिक सुरक्षा की पहल कहा गया है।
UAE और ओमान क्यों रहे अलग
इस गठबंधन में खाड़ी क्षेत्र के दो अहम देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान शामिल नहीं हुए। दोनों देशों ने औपचारिक समर्थन नहीं दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देश क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को प्राथमिकता देते हैं। खासकर ओमान लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है, जबकि UAE भी कई सुरक्षा मामलों में अलग रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाता है। हालांकि दोनों देशों ने इस पहल का सार्वजनिक विरोध भी नहीं किया है।
क्षेत्रीय राजनीति पर असर
इस नए सुरक्षा गठबंधन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। इसे मुस्लिम देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि कई विशेषज्ञों का कहना है कि इसे NATO जैसी औपचारिक सैन्य संधि मानना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि सदस्य देशों के बीच रणनीतिक और राजनीतिक मतभेद अब भी मौजूद हैं। आने वाले समय में इस गठबंधन की भूमिका क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक समुद्री व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।







