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Tales Of A Gypsy : संवेदना नहीं जानकारी चाहिए, लाखों के पैकेज छोड़ चुनी सेना, शरीर ने छोड़ा साथ , आंखों से कर रहे संवाद

कर्नल अनुराग उपाध्याय ने कॉर्पोरेट करियर के बजाय सेना चुनी और पैरा स्पेशल फोर्सेज में सेवाएं दीं। 2025 में गंभीर स्ट्रोक के बाद उन्हें लॉक्ड-इन सिंड्रोम हुआ, लेकिन चेतना पूरी तरह सक्रिय है।

by SYED BUSHRA
सितम्बर 10, 2026
in राष्ट्रीय
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Colonel Anurag Upadhyay: कर्नल अनुराग उपाध्याय की कहानी उस जज्बे की मिसाल है, जिसमें आराम और सुरक्षित करियर से ज्यादा देश की सेवा को प्राथमिकता दी गई। CAT में 99 पर्सेंटाइल हासिल करने के बाद उनके सामने कॉर्पोरेट दुनिया में शानदार करियर के रास्ते खुले थे, लेकिन उन्होंने भारतीय सेना को चुना।

उन्होंने 3 PARA (SF) में सेवा दी और 12 PARA (SF) की रेजिंग टीम का भी हिस्सा रहे। उनके सैन्य करियर में कई चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियां आईं। साल 2008 में उन्हें हार्ट अटैक भी आया, लेकिन इलाज और रिकवरी के बाद उन्होंने दोबारा सक्रिय सेवा में वापसी की।

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स्ट्रोक ने बदली जिंदगी

अगस्त 2025 में कर्नल अनुराग की जिंदगी ने एक बेहद मुश्किल मोड़ लिया। उन्हें गंभीर स्ट्रोक आया, जिसके बाद वह लॉक्ड-इन सिंड्रोम की स्थिति में पहुंच गए। इसके बाद हुई चिकित्सीय जटिलताओं के कारण उनके दोनों पैर घुटनों के नीचे से काटने पड़े।

आज उनका शरीर लगभग पूरी तरह गतिहीन है, लेकिन उनकी चेतना और समझने की क्षमता बनी हुई है। वह आसपास की चीजों को समझ और देख सकते हैं। उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी बात सामान्य तरीके से बोलकर या शरीर की हरकतों से नहीं बता सकते।

आंखों से कर रहे संवाद

लॉक्ड-इन सिंड्रोम में मरीज का दिमाग और चेतना सक्रिय रह सकती है, लेकिन शरीर की मांसपेशियों पर नियंत्रण बेहद सीमित या खत्म हो जाता है। कर्नल अनुराग फिलहाल अपनी आंखों की पुतलियों और पलकों की मदद से संवाद कर रहे हैं।

वह अल्फाबेट स्कैनिंग के जरिए अक्षरों का चयन करते हैं और इसी तरह अपनी बात दूसरों तक पहुंचाते हैं। यानी शरीर साथ नहीं दे रहा, लेकिन दिमाग और संवाद की इच्छा अब भी पूरी तरह सक्रिय है।

मदद नहीं, नई संभावना की तलाश

कर्नल अमित कुमार ने अपने साथी और पूर्व सैन्य सहयोगी के लिए सोशल मीडिया पर लोगों से मदद की अपील की है। उनका कहना है कि यह किसी तरह की दया या सहानुभूति मांगने की कोशिश नहीं है। उद्देश्य ऐसी विशेषज्ञता और तकनीक तलाशना है, जिससे कर्नल अनुराग के संवाद और जीवन को बेहतर बनाया जा सके।

इसके लिए लॉक्ड-इन सिंड्रोम के विशेषज्ञ न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरो-रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ और आधुनिक पुनर्वास केंद्रों की जानकारी मांगी गई है। साथ ही ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस यानी BCI, आई-ट्रैकिंग और दूसरी असिस्टिव टेक्नोलॉजी पर काम करने वाले शोधकर्ताओं से भी संपर्क की अपील की गई है।

देश से जुड़ने की अपील

कर्नल अनुराग के साथियों की कोशिश है कि देश और दुनिया में मौजूद विशेषज्ञों के नेटवर्क से ऐसी जानकारी मिले, जो उनके लिए उपयोगी हो सकती है। खासतौर पर बेहतर संचार तकनीक और न्यूरो-रिहैबिलिटेशन के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

अगर किसी व्यक्ति या संस्था के पास लॉक्ड-इन सिंड्रोम, उन्नत पुनर्वास, BCI या आई-ट्रैकिंग से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी है, तो सोशल मीडिया पर बताए गए Tales Of A Gypsy अकाउंट के जरिए संपर्क करने की अपील की गई है।

Tags: indian armyLocked In Syndrome
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SYED BUSHRA

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