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Gun Threat Case: कौन सी अदालत ने कहा, पिस्तौल दिखाने और जान से मारने की नीयत में फर्क

अदालत ने कहा कि केवल पिस्तौल तानना हत्या की कोशिश नहीं है। सागर को IPC 307 से राहत मिली, लेकिन अवैध हथियार रखने पर शस्त्र अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया।

by SYED BUSHRA
March 2, 2026
in दिल्ली

Court Verdict on Gun Threat Case: यह मामला सागर उर्फ रिंकू से जुड़ा है, जिस पर वर्ष 2020 में पुलिस छापेमारी के दौरान एक हेड कांस्टेबल पर पिस्तौल तानने का आरोप लगा था। दिल्ली की एक अदालत में इस केस की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ कुलश्रेष्ठ कर रहे थे। अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी ने पुलिस कार्रवाई के दौरान अपनी पिस्तौल निकालकर हेड कांस्टेबल राजेश कुमार की ओर तान दी थी, जिससे उसकी मंशा जान से मारने की थी।

हालांकि, अदालत ने इस पूरे मामले को तथ्यों और सबूतों के आधार पर परखा और यह साफ किया कि केवल पिस्तौल तान देने से किसी को हत्या की कोशिश का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि इसके साथ साफ इरादा और ठोस परिस्थिति साबित न हो।

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अदालत की अहम टिप्पणी

अदालत ने 23 जनवरी को दिए गए अपने फैसले में कहा कि सिर्फ पिस्तौल तानने की घटना, अपने आप में यह साबित नहीं करती कि आरोपी की नीयत किसी की जान लेने की थी। जज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह भी जरूरी नहीं है कि अगर दूसरे पुलिसकर्मी बीच में न आते, तो आरोपी पिस्तौल का ट्रिगर दबा ही देता।

अदालत के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की मंशा को तय करने के लिए केवल एक हरकत काफी नहीं होती। इसके लिए पूरे हालात, आरोपी का व्यवहार और घटना के समय की स्थिति को देखना जरूरी होता है।

डराने और हत्या की नीयत में अंतर

अभियोजन के मुताबिक, 14 जुलाई 2020 को पुलिस को सूचना मिली थी कि सागर किसी अपराध को अंजाम देने के इरादे से भारतीय विद्या पीठ इलाके के पास मौजूद है। इसी सूचना के आधार पर पुलिस ने उसके घर पर छापा मारा। उसी दौरान आरोपी ने कथित तौर पर पिस्तौल निकाली।

अदालत ने यह भी माना कि यह पूरी तरह संभव है कि आरोपी का इरादा पुलिसकर्मी को गोली मारने का न होकर केवल डराने का रहा हो। कानून की नजर में डराने और जान लेने की कोशिश में बड़ा अंतर है। इसलिए, अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 307 यानी हत्या के प्रयास के आरोप से आरोपी को बरी कर दिया।

शस्त्र अधिनियम के तहत सजा

हालांकि, अदालत ने आरोपी को पूरी तरह निर्दोष नहीं माना। अवैध रूप से पिस्तौल और कारतूस रखने के मामले में उसे शस्त्र अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया। इसका मतलब यह है कि हथियार रखना तो अपराध है, लेकिन हत्या की कोशिश का आरोप इस मामले में साबित नहीं हो सका।

यह फैसला साफ करता है कि कानून भावनाओं पर नहीं, बल्कि सबूतों और तथ्यों पर चलता है।

Tags: Arms Actcourt verdict

SYED BUSHRA

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