Justice Delivered After 29 Years: करीब 29 साल पुराने एक चर्चित मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों को सजा दी है। यह मामला एक युवक की हिरासत में हुई मौत से जुड़ा था, जिसमें पुलिस पर गंभीर आरोप लगे थे। अदालत ने वाराणसी के लंका थाना क्षेत्र स्थित सुंदरपुर पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी दरोगा को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। वहीं तत्कालीन वरिष्ठ उपनिरीक्षक (एसएसआई) को ड्यूटी में लापरवाही बरतने के मामले में छह महीने की सजा दी गई है। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गलत जानकारी देने के आरोप में डॉक्टरों को पांच साल की सजा सुनाई गई है। अदालत के आदेश के बाद दोषियों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया।
100 रुपये की शिकायत से शुरू हुआ मामला
मामले की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी। केस डायरी के अनुसार, सुंदरपुर पुलिस चौकी में 100 रुपये से जुड़े एक विवाद की शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने एक युवक को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। आरोप है कि हिरासत के दौरान युवक को बुरी तरह पीटा गया। बताया गया कि उस पर लाठी-डंडों से हमला किया गया, जिससे उसकी हालत गंभीर हो गई। इसी दौरान उसकी मौत हो गई।
पुलिस पर लीपापोती के आरोप
युवक की मौत के बाद पुलिस ने मामले को दबाने की कोशिश की। आरोप है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया में भी गड़बड़ी की गई और डॉक्टरों की मदद से ऐसी रिपोर्ट तैयार करवाई गई, जिससे मौत का असली कारण सामने न आ सके। इतना ही नहीं, शव का अंतिम संस्कार जल्दबाजी में कराने की भी कोशिश की गई, ताकि मामला ज्यादा न बढ़ सके। लेकिन परिवार ने इस पर आपत्ति जताई और न्याय की मांग की।
जांच में सामने आई सच्चाई
पीड़ित परिवार के विरोध और लगातार मांग के बाद मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। जांच एजेंसी ने मामले की गहराई से पड़ताल की। जांच में यह बात सामने आई कि युवक की मौत हिरासत में हुई मारपीट और थर्ड डिग्री टॉर्चर के कारण हुई थी। साथ ही यह भी पाया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाती थी। जांच में डॉक्टरों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई।
11 आरोपी बने, कई की हो चुकी थी मौत
इस मामले में कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था। हालांकि मुकदमे की लंबी प्रक्रिया के दौरान चार आरोपियों की मौत हो गई। बाकी सात आरोपियों में से तीन को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया गया। इनमें तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट और दो पुलिसकर्मी शामिल थे। शेष आरोपियों के खिलाफ सीबीसीआईडी ने अदालत में मजबूत पक्ष रखा, जिसके आधार पर अदालत ने दोष सिद्ध होने पर सजा सुनाई।
न्याय मिलने से परिवार को राहत
करीब तीन दशक तक चले इस मुकदमे के बाद आए फैसले को पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। यह फैसला इस बात का भी संदेश देता है कि कानून की प्रक्रिया भले लंबी हो, लेकिन दोषियों को सजा मिलने की संभावना बनी रहती है।




