Delhi High Court: इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपेगा, किसको कॉल रिकॉर्ड और लोकेशन डिटेल्स देखने का मिला अधिकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को पति और उसकी कथित प्रेमिका के कॉल रिकॉर्ड और लोकेशन डेटा देखने का अधिकार है। अदालत ने गोपनीयता और न्यायिक जरूरत के बीच संतुलन बनाते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश सही ठहराया।

Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर किसी पत्नी को अपने पति पर विवाहेतर संबंध यानी अडल्टरी का संदेह है, तो उसे पति और उसकी कथित प्रेमिका के कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR) और लोकेशन डिटेल्स हासिल करने का हक है। कोर्ट का मानना है कि ऐसे रिकॉर्ड्स निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ होते हैं, जो पारिवारिक विवादों में सच्चाई सामने लाने और न्यायिक प्रक्रिया में मददगार साबित हो सकते हैं।

फैमिली कोर्ट का आदेश

दरअसल, इससे पहले फैमिली कोर्ट ने पत्नी की याचिका को मंजूरी दी थी। पत्नी ने अपने पति और उसकी कथित प्रेमिका की लोकेशन डिटेल्स और कॉल रिकॉर्ड्स सुरक्षित रखने की मांग की थी। पत्नी का कहना था कि बिना इन रिकॉर्ड्स के विवाहेतर संबंध का सबूत देना असंभव है। यह दंपति अक्टूबर 2002 में शादी के बंधन में बंधा था और उनके दो बच्चे हैं। साल 2023 में पत्नी ने तलाक की अर्जी दी थी और पति पर बेवफाई और मानसिक क्रूरता का आरोप लगाया था। फैमिली कोर्ट ने 29 अप्रैल 2025 को आदेश दिया था कि जनवरी 2020 से अब तक के कॉल और लोकेशन डेटा सुरक्षित रखे जाएं।

पति और प्रेमिका की चुनौती

इसके बाद पति और उसकी कथित प्रेमिका ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि यह आदेश उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है और पत्नी का मकसद केवल परेशान करना है। पति का तर्क था कि केवल कॉल रिकॉर्ड या टावर लोकेशन से यह साबित नहीं किया जा सकता कि वह विवाहेतर संबंध में है।

हाईकोर्ट की दलील

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा और 2003 के सुप्रीम कोर्ट के “शारदा बनाम धर्मपाल” मामले का हवाला दिया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि व्यक्तिगत गोपनीयता में सीमित दखल तब ही जायज है, जब यह सच्चाई उजागर करने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हो। कोर्ट ने कहा कि कॉल रिकॉर्ड और लोकेशन डेटा निजी बातचीत की असल सामग्री नहीं बताते, बल्कि केवल तथ्यात्मक सबूत के रूप में काम करते हैं।

संतुलन पर जोर

अदालत ने कहा कि यह फैसला गोपनीयता और न्याय के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। इन रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल केवल सबूत जुटाने के लिए होगा और इनका दुरुपयोग नहीं किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश पारिवारिक विवादों में पारदर्शिता बढ़ाएगा और झूठे आरोपों से बचाने में भी मदद करेगा।

भविष्य के लिए अहम संदेश

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला तलाक और पारिवारिक विवादों के मामलों में डिजिटल डेटा की अहमियत को दर्शाता है। अब केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकेगा, बल्कि ठोस सबूतों की आवश्यकता होगी। इस तरह के फैसले भविष्य में परिवार से जुड़े मामलों के लिए एक दिशा-निर्देश बन सकते हैं।

हाईकोर्ट का यह निर्णय बताता है कि विवाहेतर संबंध जैसे संवेदनशील मामलों में सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित प्रमाण ज़रूरी हैं। कॉल रिकॉर्ड और लोकेशन डिटेल्स को सबूत के रूप में इस्तेमाल कर न्याय प्रक्रिया को और निष्पक्ष बनाया जा सकता है।

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