Gestational Diabetes: गर्भावस्था के दौरान पहली बार हाई ब्लड शुगर की स्थिति को जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गर्भावस्था के 24 से 28 सप्ताह के बीच 75 ग्राम ग्लूकोज टेस्ट के जरिए इसकी जांच की जाती है। जिन महिलाओं में डायबिटीज का जोखिम अधिक है, उनमें डॉक्टर इससे पहले भी जांच की सलाह दे सकते हैं।
किन महिलाओं में ज्यादा रहता है खतरा?
मोटापा, अधिक उम्र, PCOS/PCOD, हाई ब्लड प्रेशर और परिवार में डायबिटीज का इतिहास जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है। पिछली प्रेग्नेंसी में यह समस्या रही हो तो दोबारा होने की संभावना भी बढ़ सकती है। शारीरिक गतिविधि की कमी और असंतुलित खानपान भी जोखिम बढ़ाने वाले कारक हो सकते हैं।
मां और बच्चे पर क्या असर पड़ता है?
जेस्टेशनल डायबिटीज से गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर और समय से पहले डिलीवरी जैसी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। बच्चे का वजन ज्यादा होने, पीलिया, जन्म के बाद लो ब्लड शुगर और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। लंबे समय में बच्चे में मोटापा और डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।
वहीं, मां में आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
खानपान और एक्सरसाइज पर दें ध्यान
डॉक्टर की सलाह के अनुसार संतुलित डाइट लेना जरूरी है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त प्रोटीन, फाइबर, सब्जियां, फल और कम फैट वाले डेयरी उत्पाद डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। मीठे पेय, जूस और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से बचना बेहतर है।
गर्भावस्था में डॉक्टर की अनुमति से रोजाना करीब 30 मिनट पैदल चलना भी फायदेमंद हो सकता है। इससे ब्लड शुगर और वजन को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
जरूरत पड़ने पर दवाएं भी जरूरी
अगर डाइट और एक्सरसाइज से ब्लड शुगर नियंत्रित नहीं होता तो डॉक्टर दवा या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं। ब्लड शुगर की नियमित निगरानी भी जरूरी है। डिलीवरी के बाद भी जांच कराते रहना महत्वपूर्ण है, क्योंकि जेस्टेशनल डायबिटीज के बाद भविष्य में डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।


