Telegram Scam Recruitment:100 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी करने वाले गिरोह में जालसाजों की भर्ती टेलीग्राम एप के जरिए की जाती थी। पुलिस पूछताछ में सामने आया कि कॉल सेंटर का हेड प्रियांशु उर्फ शिवा टेलीग्राम पर प्रचार कर युवाओं से संपर्क करता था। इसके बाद उनका ऑनलाइन इंटरव्यू लिया जाता था।
चयन के बाद युवाओं को लखनऊ बुलाया जाता और करीब 15 से 20 दिन तक ट्रेनिंग दी जाती थी। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अहमदाबाद में बैठा गिरोह का कथित मास्टरमाइंड वीडियो कॉल पर इंटरव्यू लेता था। उसकी मंजूरी के बाद ही किसी को गिरोह में शामिल किया जाता था।
टेलीग्राम पर होती भर्ती
पुलिस के अनुसार गिरोह में अलग-अलग शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं को शामिल किया गया था। गिरफ्तार 16 आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि इनमें बीटेक, एमबीए और स्नातक करने वालों के साथ 12वीं और 10वीं पास युवक भी शामिल थे।
जालसाजों को हर महीने करीब 25 से 30 हजार रुपये वेतन दिया जाता था। सेंटर पर उनके रहने और खाने की व्यवस्था भी निशुल्क थी। रात का खाना ऑनलाइन डिलीवरी एजेंसियों के जरिए सेंटर पर ही मंगाया जाता था।
स्क्रिप्ट याद करा कराते ठगी
ट्रेनिंग के दौरान कर्मचारियों को ठगी के लिए तैयार की गई स्क्रिप्ट याद कराई जाती थी। अंग्रेजी जानने वाले कर्मचारियों के अलावा कम पढ़े-लिखे लोगों को हिंदी में अंग्रेजी के वाक्य लिखकर दिए जाते थे।
इसके बाद उन्हें उसी स्क्रिप्ट के आधार पर विदेशों में रहने वाले लोगों से बातचीत करने की ट्रेनिंग दी जाती थी। कॉल सेंटर में अमेरिका के कामकाजी समय के अनुसार रात में काम कराया जाता था।
हवाला से आता था पैसा
इंस्पेक्टर अलीगंज ध्रुव कुमार के मुताबिक गिरोह अमेरिका से रकम हवाला के जरिए मंगाता था। पहले रकम अहमदाबाद पहुंचती थी और वहां से लखनऊ भेजी जाती थी। इसी रकम से कर्मचारियों का वेतन, बिल्डिंग का किराया और दूसरे खर्च पूरे किए जाते थे।
पुलिस की शुरुआती जांच में अभी तक गिरोह का कोई बैंक खाता सामने नहीं आया है। ऐसे में पुलिस हवाला के जरिए होने वाले लेनदेन की जानकारी जुटाने में लगी है।
जेवर भी लेते थे ठग
गिरोह के सदस्य केवल गिफ्ट कार्ड या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए रकम नहीं लेते थे। पूछताछ में पता चला कि अगर कोई अमेरिकी नागरिक गिफ्ट कार्ड या क्रिप्टो में भुगतान करने में असमर्थता जताता था, तो उससे जेवर भी लिए जाते थे।
जेवर लेने के लिए गिरोह का हैंडलर पीड़ित के घर तक पहुंचता था। वहां उसे बताया जाता था कि जेवर को सरकारी खजाने में सुरक्षित रखा जाएगा। पुलिस को कॉल सेंटर से बरामद मोबाइल फोन और लैपटॉप में इस तरह की गतिविधियों से जुड़े साक्ष्य भी मिले हैं।
अमेरिकी समय पर कॉल
सहायक पुलिस आयुक्त अलीगंज शशि प्रकाश मिश्र के मुताबिक जालसाजों की भर्ती टेलीग्राम के जरिए की जाती थी। भर्ती के बाद उन्हें ठगी के तरीके और बातचीत की स्क्रिप्ट सिखाई जाती थी।
पुलिस अब गिरोह के मास्टरमाइंड और हवाला नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। साथ ही बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच के जरिए गिरोह से जुड़े अन्य लोगों और ठगी के मामलों की जानकारी जुटाई जा रही है।



