Sterling Balance: 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ तो देश के सामने सिर्फ गरीबी, विभाजन और विस्थापन जैसी चुनौतियां नहीं थीं, बल्कि अंग्रेजों के साथ आर्थिक हिसाब-किताब का सवाल भी था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने भारत से बड़ी मात्रा में सामान, सेवाएं और युद्ध संबंधी संसाधन लिए थे। इनके बदले ब्रिटेन के खाते में भारत के नाम एक बड़ी रकम जमा हुई, जिसे स्टर्लिंग बैलेंस कहा गया।
कितनी थी रकम?
रिपोर्टों के मुताबिक, आजादी के समय ब्रिटेन पर भारत का बकाया करीब 1,300 मिलियन पाउंड था। आज की मुद्रा के हिसाब से इसकी कीमत करीब 66 अरब पाउंड बताई जाती है। भारतीय रुपये में इसका मूल्य करीब 8.5 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। हालांकि अलग-अलग आकलनों में रकम और उसकी मौजूदा कीमत अलग हो सकती है, क्योंकि पुराने समय की मुद्रा को आज के मूल्य में बदलने का तरीका अलग-अलग हो सकता है।
युद्ध में कैसे जमा हुआ पैसा?
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन को युद्ध लड़ने के लिए भारी मात्रा में धन और संसाधनों की जरूरत थी। भारत से सैनिकों के साथ-साथ खाद्य सामग्री, कच्चा माल, कपड़े और दूसरी जरूरी वस्तुएं भी ली गईं। इन खर्चों का भुगतान तत्काल नकद में करने के बजाय ब्रिटेन ने भारत के नाम स्टर्लिंग खाते में रकम जमा की। यही रकम आगे चलकर भारत के लिए बड़ा वित्तीय दावा बनी।
ब्रिटेन से हुई बातचीत
आजादी के बाद भारत और ब्रिटेन के बीच इस रकम को लेकर कई दौर की बातचीत हुई। ब्रिटेन उस समय युद्ध के कारण गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था और पूरी रकम तुरंत चुकाने की स्थिति में नहीं था। इसलिए दोनों देशों के बीच भुगतान और रकम के इस्तेमाल को लेकर समझौते किए गए। कुछ हिस्से को भारत ने ब्रिटेन से रक्षा सामग्री और दूसरी जरूरी चीजों की खरीद में इस्तेमाल किया।
पूरा पैसा क्यों नहीं मिला?
इतिहासकारों के अनुसार, भारत को स्टर्लिंग बैलेंस की पूरी रकम सीधे नकद के रूप में हासिल नहीं हुई। आजादी के बाद हुए अलग-अलग समझौतों, ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति और रकम के इस्तेमाल से इसका वास्तविक मूल्य और उपलब्ध राशि बदलती गई। इसके बावजूद यह रकम उस समय भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। देश विभाजन, खाद्य संकट, गरीबी और कमजोर आर्थिक ढांचे जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा था। ऐसे में ब्रिटेन पर जमा यह बकाया भारत की शुरुआती अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था।







