सहारनपुर में पिछले हफ्ते हुई राष्ट्रीय लोक दल की स्वाभिमान रैली में जयंत चौधरी के साथ उनकी पत्नी चारू चौधरी भी मंच पर नजर आईं। उन्होंने सिर्फ मौजूदगी दर्ज नहीं कराई, बल्कि माइक संभालकर कहा कि किसी को भी किसी दूसरे व्यक्ति का अपमान करने का अधिकार नहीं है। देखने में यह एक सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम लग सकता है, लेकिन राजनीति में मंच पर किसे जगह मिलती है और कौन बोलता है, इसके अपने मायने होते हैं। इसलिए चारू की यह सक्रिय मौजूदगी अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है।
सपा से तुलना
पिछले कुछ समय से समाजवादी पार्टी में भी सांसद डिंपल यादव की राजनीतिक मौजूदगी पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई दे रही है। 20 जुलाई को CJP के संसद मार्च के दौरान डिंपल सड़क पर प्रदर्शनकारियों और युवाओं के बीच नजर आई थीं। वहीं संसद के भीतर अखिलेश यादव सरकार पर हमला बोल रहे थे। दोनों की अलग-अलग जगहों पर मौजूदगी ने पार्टी के भीतर एक तरह का राजनीतिक संतुलन भी दिखाया। अब इसी संदर्भ में सवाल उठ रहा है कि क्या RLD भी महिला चेहरे को आगे लाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
महिला चेहरों पर जोर
चारू चौधरी की RLD में आगे क्या भूमिका होगी, इस पर अभी निश्चित तौर पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। जयंत चौधरी जहां चौधरी चरण सिंह की विरासत और किसान राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं, वहीं चारू महिलाओं और दूसरे सामाजिक वर्गों तक पार्टी की पहुंच बनाने का माध्यम बन सकती हैं। खासकर महिला मतदाताओं के बीच उनकी सक्रियता RLD के लिए अलग राजनीतिक संदेश दे सकती है। हालांकि, पार्टी की वास्तविक रणनीति उसके आने वाले कदमों से ही स्पष्ट होगी।
असली सवाल यही
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चारू चौधरी आगे महिलाओं के बीच RLD का चेहरा बनेंगी या उनकी भूमिका जयंत चौधरी को पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर समर्थन देने तक सीमित रहेगी। अभी किसी औपचारिक जिम्मेदारी या संगठनात्मक भूमिका की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल उनकी रैली में मौजूदगी को संभावित राजनीतिक संकेत के रूप में देखना ज्यादा सही होगा। अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अगर उनकी सक्रियता बढ़ती है, तो इसे पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा सकता है।
युवाओं की ताकत
CJP आंदोलन और उसके बाद बने राजनीतिक माहौल ने भी पार्टियों को युवाओं और महिलाओं की भूमिका पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है। अब युवा और महिलाएं सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि अपनी राय बनाने और दूसरों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण वर्ग के तौर पर देखे जा रहे हैं। इसी वजह से राजनीतिक दल सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक युवाओं के साथ सीधा संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों के बीच महिला नेताओं और चेहरों को आगे बढ़ाना पार्टियों के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद रणनीति भी हो सकती है। ऐसे में चारू चौधरी की मंच पर बढ़ती मौजूदगी को आने वाले समय में करीब से देखना दिलचस्प होगा।







