Lucknow Fire Victims Story : लखनऊ में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने कई परिवारों की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं। इस हादसे में अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें बाराबंकी जिले के रहने वाले दो युवा, मोहम्मद शाहजान और मोहम्मद अम्मार भी शामिल हैं। दोनों के शव जब देर रात उनके घर पहुंचे, तो पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है और हर किसी की आंखें नम हैं।
‘पापा मुझे बचा लो’ बनी आखिरी आवाज
बाराबंकी के फतेहपुर कस्बे के रहने वाले मोहम्मद शाहजान उस समय कोचिंग सेंटर के एक कमरे में फंस गए थे। आग तेजी से फैल रही थी और धुआं पूरे कमरे में भर चुका था। इसी दौरान उन्होंने अपने पिता मोहम्मद इमरान को फोन किया। रोते हुए शाहजान ने कहा, “पापा, मुझे बचा लो।” बेटे की आवाज सुनते ही पिता घबराकर घटनास्थल की ओर दौड़े। बताया जाता है कि वह कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच गए थे, लेकिन तब तक आग बहुत भयानक रूप ले चुकी थी। वह चाहकर भी अपने बेटे तक नहीं पहुंच सके।
मदद की जगह बनते रहे वीडियो
शाहजान के पिता का आरोप है कि उन्होंने मौके पर मौजूद लोगों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन बहुत कम लोग आगे आए। उनका कहना है कि कई लोग अपने मोबाइल फोन से वीडियो बनाने में लगे रहे, जबकि अंदर लोग जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर समय रहते राहत और बचाव का काम तेज होता, तो शायद कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
सुरक्षा इंतजामों पर उठे सवाल
परिजनों ने कोचिंग सेंटर और संबंधित जिम्मेदार लोगों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि इमारत में आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। बताया गया कि जिस कमरे में शाहजान मौजूद थे, उसका दरवाजा लॉक हो गया था और धुआं भरने से उनका दम घुट गया। परिवार का कहना है कि अगर सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होती, तो यह हादसा इतना बड़ा नहीं बनता।
अम्मार भी बने हादसे का शिकार
इस हादसे में बाराबंकी के गदिया गांव निवासी 24 वर्षीय मोहम्मद अम्मार की भी मौत हो गई। अम्मार उसी इमारत में ग्राफिक्स डिजाइनर के रूप में काम करते थे। आग लगने के समय वह भी भवन के अंदर मौजूद थे और गंभीर रूप से झुलस गए। इलाज का मौका मिलने से पहले ही उनकी जिंदगी खत्म हो गई। उनकी मौत की खबर मिलते ही पूरे मोहल्ले में मातम छा गया।
परिवार का सहारा छिन गया
मोहम्मद अम्मार अपने परिवार के सबसे बड़े बेटे थे। उनके कंधों पर घर की जिम्मेदारी थी। उनके पिता मंसूर आलम मेहनत-मजदूरी और वेल्डिंग का काम करके परिवार का खर्च चलाते हैं। बेटे की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया है। वहीं शाहजान के माता-पिता भी गहरे सदमे में हैं। दोनों परिवारों के सपने एक ही हादसे में बिखर गए। अब हर किसी की जुबान पर यही सवाल है कि आखिर ऐसी लापरवाही की कीमत कब तक लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।









