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Folk Voice: कौन है प्रतीक्षा यादव जिन्होंने बुंदेलखंड की लोक विरासत बचाने का लिया संकल्प, आल्हा गायन में बनाई अलग पहचान

Pratiksha Yadav Alha Singing

महोबा की 18 वर्षीय प्रतीक्षा यादव इन दिनों अपनी बुलंद आवाज और बुंदेलखंड की पारंपरिक लोक विधा आल्हा गायन को लेकर चर्चा में हैं। छोटी बहन दीक्षा यादव भी उनके साथ इस लोक परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। दोनों बहनों ने उस धारणा को चुनौती दी है, जिसमें आल्हा गायन को लंबे समय तक पुरुषों से जुड़ी विधा माना जाता रहा है। प्रतीक्षा के लिए आल्हा केवल गीत या मनोरंजन नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के इतिहास, वीरता और संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण विरासत है।

पिता से मिली प्रेरणा

प्रतीक्षा और दीक्षा बचपन से ही लोक गायन से जुड़ी हुई हैं। प्रतीक्षा बताती हैं कि उनके पिता और आल्हा सम्राट बच्चों सिंह ने उन्हें इस विधा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। बचपन में एक बार बच्चों सिंह ने प्रतीक्षा को नृत्य करते हुए देखा। इसके बाद उन्होंने उनके पिता से कहा कि अगर बेटी नृत्य कर सकती है तो आल्हा भी गा सकती है। इसी बात ने प्रतीक्षा के जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने आल्हा गायन सीखना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी आवाज और प्रस्तुति ने अलग पहचान बना ली।

अखिलेश ने फिर बुलाया

Pratiksha Yadav Alha Singing:लखनऊ में समाजवादी पार्टी के एक कार्यक्रम में प्रतीक्षा को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। उन्होंने महाराजा खेत सिंह खंगार से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों के साथ पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पर आधारित आल्हा की कड़ियां प्रस्तुत कीं। प्रतीक्षा के मुताबिक, उनकी प्रस्तुति के दौरान अखिलेश यादव ने तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब वह वहां से जाने लगीं तो उन्हें दोबारा बुलाया गया। अखिलेश यादव ने उनसे नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव पर कविता सुनाने को कहा। प्रतीक्षा के लिए यह पल बेहद खास रहा।

वीरता की कहानी

आल्हा गायन में बुंदेलखंड की वीरता, संघर्ष और ऐतिहासिक घटनाओं को गीतों के जरिए प्रस्तुत किया जाता है। प्रतीक्षा बताती हैं कि महोबा पर आए संकट और पृथ्वीराज चौहान की घेराबंदी जैसे प्रसंगों को गाते समय माहौल बेहद भावुक हो जाता है। रानी मल्हना द्वारा वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल को याद करने वाले प्रसंगों की प्रस्तुति के दौरान कई बार प्रतीक्षा की अपनी आंखें भी नम हो जाती हैं। उनका कहना है कि आल्हा में सिर्फ वीरता नहीं, बल्कि भावनाएं और इतिहास भी समाए हुए हैं।

लोक विधा का सपना

प्रतीक्षा चाहती हैं कि आल्हा गायन को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। उनका मानना है कि आज युवा पॉप और रैप जैसे आधुनिक संगीत की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, इसलिए पारंपरिक लोक विधाओं को बचाने के लिए उन्हें शिक्षा और सांस्कृतिक मंचों से जोड़ना जरूरी है। वह चाहती हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में भी आल्हा जैसी लोक विधाओं को सिखाया जाए। उनका सपना बुंदेलखंड की लोक संस्कृति और आल्हा गायन को देशभर में पहचान दिलाना है, ताकि पूर्वजों और वीर योद्धाओं से जुड़ी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके।

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