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Satellite Communication: क्या लैपटॉप जैसे फ्लैट एंटीना बदल सकते हैं सैटेलाइट कम्युनिकेशन की दुनिया,जानिए क्या है नई ArrayLink तकनीक

अमेरिकी शोधकर्ताओं ने ArrayLink नामक नई तकनीक विकसित की है, जो बड़े गोल डिश एंटीना की जगह छोटे फ्लैट एंटीना नेटवर्क का उपयोग करती है। यह तकनीक सैटेलाइट डेटा क्षमता बढ़ाने, लागत कम करने और 5G टावरों को ग्राउंड स्टेशन में बदलने की क्षमता रखती है।

by Sadaf Farooqui
June 4, 2026
in टेक्नोलॉजी
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Satellite Communication: कार्यालयों और टेलीकॉम टावरों पर लगे गोल डिश एंटीना पिछले कई वर्षों से सैटेलाइट संचार का अहम हिस्सा रहे हैं। टीवी प्रसारण से लेकर इंटरनेट और अन्य संचार सेवाओं तक, इन एंटीना का व्यापक उपयोग किया जाता रहा है। लेकिन अब भविष्य में इन पारंपरिक डिश एंटीना की जगह फ्लैट और छोटे एंटीना पैनल ले सकते हैं।

अमेरिका के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो सैटेलाइट और पृथ्वी के बीच डेटा कनेक्टिविटी को अधिक तेज, सस्ता और प्रभावी बना सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में सैटेलाइट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।

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यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया ने विकसित किया ArrayLink सिस्टम

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के इंजीनियरों ने “ArrayLink” नामक एक नई तकनीक विकसित की है। इस सिस्टम का उद्देश्य बड़े मैकेनिकल सैटेलाइट डिशों को छोटे-छोटे फ्लैट फेज्ड-अरे एंटीना पैनलों के नेटवर्क से बदलना है।

इन एंटीना पैनलों को घरों की छतों, टेलीकॉम टावरों और अन्य इमारतों पर आसानी से लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह तकनीक सैटेलाइट डेटा क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ ग्राउंड स्टेशन की लागत को भी काफी कम कर सकती है।

क्यों जरूरी है यह नई तकनीक?

आज के दौर में सैटेलाइट संचार केवल इंटरनेट सेवाओं तक सीमित नहीं है। GPS नेविगेशन, बैंकिंग ट्रांजैक्शन, मौसम पूर्वानुमान, सैन्य संचार, आपदा प्रबंधन, विमानन, समुद्री परिवहन और रिमोट हेल्थकेयर जैसी कई महत्वपूर्ण सेवाएं सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर हैं।

पिछले कुछ वर्षों में पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय सैटेलाइटों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आने वाले समय में हजारों नए सैटेलाइट लॉन्च होने की संभावना है, जिससे मौजूदा ग्राउंड स्टेशनों पर दबाव और बढ़ सकता है।

बड़े डिश एंटीना क्यों बन रहे हैं चुनौती?

वर्तमान में अधिकांश ग्राउंड स्टेशन 1.8 मीटर या उससे बड़े पैराबोलिक डिश एंटीना का उपयोग करते हैं। ये एंटीना एक समय में केवल एक सैटेलाइट को ट्रैक कर सकते हैं और लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स का पीछा करने के लिए लगातार घूमते रहते हैं।

सैटेलाइट बदलने की प्रक्रिया में कई सेकंड से लेकर लगभग एक मिनट तक का समय लग सकता है। इस दौरान डेटा ट्रांसमिशन प्रभावित होता है और सिस्टम की कार्यक्षमता कम हो जाती है।

कैसे काम करता है ArrayLink?

ArrayLink तकनीक में एक बड़े एंटीना की बजाय कई छोटे फेज्ड-अरे एंटीना पैनलों का उपयोग किया जाता है। लैपटॉप के आकार के करीब 16 एंटीना पैनल एक किलोमीटर तक के क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर लगाए जाते हैं।

अकेले ये पैनल सीमित क्षमता रखते हैं, लेकिन एक साथ नेटवर्क के रूप में काम करते हुए बड़े डिश एंटीना जैसी शक्ति और प्रदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

तीन गुना तक बढ़ सकती है डेटा क्षमता

इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ही सैटेलाइट से एक साथ कई स्वतंत्र डेटा स्ट्रीम प्राप्त कर सकती है। यह “Near-Field Line-of-Sight MIMO” सिद्धांत पर आधारित है, जो आधुनिक Wi-Fi राउटर और 5G नेटवर्क में इस्तेमाल होने वाली MIMO तकनीक से मिलता-जुलता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार ArrayLink पारंपरिक सैटेलाइट सिस्टम की तुलना में तीन गुना तक अधिक डेटा थ्रूपुट प्रदान कर सकता है, जिससे डेटा ट्रांसफर की गति और नेटवर्क क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा।

5G टावर बन सकते हैं भविष्य के सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन

शोध टीम का मानना है कि भविष्य में इन फ्लैट एंटीना नेटवर्क को सीधे 5G सेल टावरों पर लगाया जा सकता है। इन टावरों पर पहले से बिजली, फाइबर नेटवर्क और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, जिससे उन्हें सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन के रूप में इस्तेमाल करना आसान होगा।

यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है, तो आने वाले वर्षों में सैटेलाइट संचार का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है और गोल डिश एंटीना इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं।

Tags: ArrayLinkFlat AntennaSatellite Communication
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Sadaf Farooqui

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