Lucknow Fire Tragedy Accountability: “पापा… प्लीज मुझे बचा लो…” यह सिर्फ एक बेटे की आखिरी पुकार नहीं थी। यह उस दर्द की आवाज थी, जिसे देश बार-बार सुनता है, लेकिन शायद जल्द ही भूल भी जाता है। लखनऊ के हालिया अग्निकांड में 23 वर्षीय गेम डिजाइनर सुखमनी सिंह ने अपने पिता को फोन कर मदद मांगी थी। कुछ ही देर बाद फोन बंद हो गया और एक परिवार का सपना हमेशा के लिए टूट गया।
यह घटना केवल एक आग लगने की खबर नहीं है। यह हमारी व्यवस्था, सुरक्षा नियमों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आखिर कैसे एक ऐसी इमारत में लोग काम और पढ़ाई कर रहे थे, जहां आपात स्थिति में सुरक्षित बाहर निकलने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी?
हादसे के बाद क्यों दोहराई जाती है वही कहानी?
देश में बड़े हादसों के बाद अक्सर एक जैसी तस्वीर देखने को मिलती है। मुआवजे की घोषणा होती है, जांच समिति बनाई जाती है, कुछ अधिकारियों को निलंबित किया जाता है और फिर धीरे-धीरे मामला लोगों की यादों से धुंधला पड़ जाता है। इससे पहले भी सूरत के कोचिंग सेंटर अग्निकांड, राजकोट गेमिंग जोन हादसे, दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड और मुंबई के कमला मिल्स अग्निकांड जैसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हर बार अवैध निर्माण, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और लापरवाही की बातें सामने आती हैं।
क्या सिर्फ आग जिम्मेदार होती है?
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में केवल आग या हादसा जिम्मेदार नहीं होता। असली कारण अक्सर सुरक्षा मानकों की अनदेखी, समय पर निरीक्षण न होना और नियमों का सही तरीके से पालन न कराया जाना होता है। जब किसी भवन में पर्याप्त निकास मार्ग नहीं होते, फायर सेफ्टी उपकरण ठीक से काम नहीं करते या आपातकालीन योजना केवल कागजों तक सीमित रहती है, तब एक छोटी चूक भी बड़ी त्रासदी में बदल जाती है।
युवाओं की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
भारत खुद को दुनिया के सबसे युवा देशों में गिनता है। यहां युवाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत बताया जाता है। शिक्षा, रोजगार, तकनीक और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में युवाओं की भूमिका की लगातार चर्चा होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उन्हें सुरक्षित माहौल दे पा रहे हैं? अगर कोचिंग सेंटर, ट्रेनिंग संस्थान, दफ्तर, अस्पताल और सार्वजनिक भवन पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, तो विकास के दावे अधूरे नजर आते हैं।
जांच से ज्यादा जरूरी है जवाबदेही
हर हादसे के बाद जांच होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है जिम्मेदारी तय होना। लोगों की मांग है कि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और जिम्मेदार अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित सुरक्षा जांच, पारदर्शी व्यवस्था और नियमों का कड़ाई से पालन ही ऐसे हादसों को रोक सकता है।
आखिर कब बदलेगी तस्वीर?
लखनऊ अग्निकांड ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम हर त्रासदी के बाद केवल दुख व्यक्त करेंगे या फिर व्यवस्था में स्थायी बदलाव भी लाएंगे। किसी भी देश की असली प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से मापी जाती है। जब तक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे हादसे समाज के सामने कठिन सवाल खड़े करते रहेंगे।







